अप्रैल 1946 में रणनीति और योजना समिति की ज्वायंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ की
एक बैठक में अमरीकी विदेश विभाग के एक आला अधिकारी ने कहा था कि "व्यवहारिक तौर वपर सभी सदस्य मानते हैं कि ग्रीनलैंड को खरीदने के पीछे कारण
डेनमार्क होना चाहिए."
समाचार एजेंसी एपी के अनुसार, "इस समिति ने कहा कि देश के पास अब काफ़ी पैसा है. डेनमार्क के लिए ग्रीनलैंड अब फ़ायदे का सौदा नहीं रह गया है और अमरीका की सुरक्षा के लिए ये ज़रूरी है कि इस
इलाके को खुद में शामिल कर लिया जाए."
बराक ओबामा प्रशासन के दौरान डेनमार्क के लिए अमरीकी राजदूत रह चुके रूफ़स गिफ़ोर्ड उस वक्त के देश के हालात के बारे में बताते हैं.
एनपीआर
को दिए अपने साक्षात्कार में उहोंने कहा, "1946 में हमारे लिए ये देखना महत्वपूर्ण था कि राजनीतिक और भौगौलिक तौर पर हमारी स्थिति क्या थी. ये दूसरे विश्व युद्ध के बाद और शीत युद्ध शुरु होने के पहले का दौर था. यूरोप
में जारी राजनीतिक अस्थिरता को ले कर अमरीका काफ़ी चिंतित था."
"इस
तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं की दुश्मन ग्रीनलैंड के रास्ते अमरीका के नज़दीक पहुंच सकते हैं. ऐसे में ग्रीनलैंड ख़तरनाक बन गया था."
गिफॉर्ड
मानते हैं कि मौजूदा हालात अलग हैं. वो कहते हैं आज के वक्त में ग्रीनलैंड के साथ अमरीका के बेहतर और मज़बूत रक्षा और आर्थिक संबंध हैं.
वो मानते हैं कि ऐसा नहीं लगता कि अब अमरीका के लिए ग्रीनलैंड को ख़रीदना ज़रूरी रह गया है.
1940 के दशक के अंत में ट्रूमैन के प्रस्ताव को लेकर डेनमार्क की
प्रतिक्रिया सकारात्मक नहीं थी. लेकिन साल 1950 तक अमरीका इस तरह के आदेश
हासिल करने में कामयाब रहा जिसके तहत वो ग्रीनलैंड में अपना एक सैन्य अड्डा बना सकता था. ये शीत युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले की बात थी.
अमरीका
के समुद्रतट से काफ़ी दूर स्थित उत्तर में मौजूद अमरीकी सेना का टूली हवाई
अड्डा, इस बात की गवाही देता है कि अमरीका के लिए ग्रीनलैंड आज भी बेहद
अहम है.
सच कहें तो चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के बीच अमरीका में कई लोग ट्रंप के इस बयान का समर्थन करते हैं कि ग्रीनलैंड को अमरीका के
कब्ज़े में लाया जाना चाहिए.
आर्कटिक सर्कल से बीजिंग की दूरी 3,000 किमी. (1,800 मील) है लेकिन चीन वहां निवेश के नए आयाम ढूंढ़ रहा है.
आर्कटिक की बर्फ़ से सामान की आवाजाही के रास्ते बनाने के लिए कई आइसब्रेकर्स (बर्फ़ पर चलने वाले जहाज़) चीन ने ख़रीद लिए हैं या वहां भेज दिए हैं. इनमें परमाणु शक्ति से चलने वाले आइसब्रेकर्स भी शामिल हैं.
इस काम को अंजाम देने के लिए चीन की नज़र ग्रीनलैंड पर है. यहां चीन अपने पोलर सिल्क रोड पर स्टेशन बनाने की संभावनाएं ढूंढ़ रहा है.
रिपब्लिकन पार्टी के नेता माइक गैलाघर ने ट्वीट किया, "ये एक स्मार्ट फ़ैसला है. ग्रीनलैंड अमरीका के लिए रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है और
बेहिचक इस पर विचार किया जाना चाहिए."
माना पूर्व राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन की ये कोशिश नाकाम रही थी. लेकिन दो देशों के बीच इस तरह का सौदा पहले भी क़ामयाब रहा है.
1917 में अमरीका ने डेनमार्क के कब्ज़े में रहे वेस्ट इंडीज़ को अमरीका ने एक सौदे के तहत ख़रीदा था. इन द्वीपों को नामकरण अमरीका के वर्जिन द्वीप के तौर पर किया गया.
गिफोर्ड
कहते हैं, उस वक्त अमरीका को अच्छी क़ीमत पर ये द्वीप मिला था. एनपीआर को
दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि "डेनमार्क के लोग अभी भी इस झटके से
उबर रहे हैं."
"इससे मुझे ये तो पता चलता है कि दोबारा ऐसा कुछ नहीं होगा. वो फिर से इतिहास नहीं दोहरांगे."
Tuesday, August 20, 2019
Wednesday, June 26, 2019
चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम
15 (1). राज्य किसी नागरिक से केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इसमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा.
इसी आर्टिकल 15 के बारे में सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वक़ील अवनि बंसल कहती हैं कि संविधान समानता का अधिकार देता है.
संविधान की रचना ही इस आधार पर की गई है कि देश के किसी नागरिक के साथ भेदभाव न हो लेकिन यह सच्चाई है कि संविधान में लिखित तथ्यों का ज़मीनी स्तर पर पालन नहीं हो पाता.
अवनि मानती हैं कि भले ही क़ानून कुछ भी कहे लेकिन उसे ज़मीनी स्तर पर लागू कराने की ज़िम्मेदारी प्रशासन की है और ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्रशासन इसका सख़्ती से पालन करवाए.
ऊना में दलितों की पिटाई. देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों की बारात रोकने और मुसलमानों के साथ गाय को लेकर हुई मारपीट. ऐसी घटनाओं को याद करें तो आप पाएंगे कि आर्टिकल 15 को बार-बार याद रखने की ज़रूरत क्यों है?
आर्टिकल 15 के ट्रेलर के कुछ दृश्य साल 2014 में बदायूं के कटरा शहादतगंज गांव में दो चचेरी बहनों की मौत से जुड़े हुए लगते हैं.
इस मामले में दो चचेरी बहनों के शव पेड़ से लटके मिले थे. पहले गैंग रेप के बाद हत्या की बात कही गई, फिर कहा गया कि दोनों बहनों ने आत्महत्या कर ली. कई बार ये भी बयान आया कि बच्चियों के पिता ने उनकी हत्या कर दी.
ट्रेलर में आयुष्मान खुराना भेदभाव ख़त्म करने की बात करते हुए नज़र आते हैं.
ये फ़िल्म 28 जून को रिलीज़ होगी लेकिन कुछ लोगों ने ट्रेलर पर आपत्ति जताना शुरू कर दिया है. वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल का मानना है कि इस तरह की फ़िल्मों से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.
दिलीप मंडल कहते हैं, ''ये एंटी-कास्ट फ़िल्म नहीं है बल्कि जाति को लेकर जो समाज में सालों से चली आ रही धारणाएं हैं ये फ़िल्म उन्हीं को पुष्ट करती है. यह फ़िल्म मानती है कि दलितों को आज भी अपने उद्धार के लिए एक मुक्ति दाता की ज़रूरत है और ये काम दलित ख़ुद नहीं कर सकते. फ़िल्म में यह उद्धारकर्ता एक ब्राह्मण आईपीएस है.''
दिलीप कहते हैं, ''किसी भी समाज में परिवर्तन आंतरिक तौर पर होता है, उसे बाहर से थोपा नहीं जा सकता और यह माना जाना चाहिए कि दलित अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं और परिवर्तन हो रहा है. ये फ़िल्म चल रही लड़ाई को पीछे ही ले जाएगी.''
लेकिन गौरव फ़िल्म को लेकर अभी किसी भी तरह की राय बना लेने को जल्दबाज़ी कहते हैं. उनका कहना है कि ट्रेलर किसी भी फ़िल्म का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा होता है, उसके आधार पर पूरी फ़िल्म की कल्पना कर लेना सही नहीं.
अब फ़िल्म इस सोच को आगे ले जाएगी या वाकई 'फ़र्क़' लाने में कामयाब होगी ये तो 28 तारीख़ के बाद ही तय हो पाएगा. पर जैसा कि फ़िल्म ये दावा करती है कि यह सत्य घटनाओं पर आधारित है तो आइए आपको इस फ़िल्म के एक सीन के साथ छोड़ जाते हैं. ताकि आप तय कर सकें कि ट्रेलर वाक़ई सच के क़रीब है?
सिर्फ़ तीन रुपए...
जो मिनरल वाटर आप पी रहे हैं, उसके दो या तीन घूंट के बराबर
उनकी इस ग़लती की वजह से उनका रेप हो गया सर
उनको मारकर पेड़ पर टांग दिया गया ताकि पूरी ज़ात को उनकी औक़ात याद रहे."
आर्टिकल 15 फ़िल्म के सह-लेखक गौरव सोलंकी ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''यह फ़िल्म सिर्फ़ एक घटना पर आधारित नहीं है. हर रोज़ कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है और ये फ़िल्म उन सभी घटनाओं को समाहित करती है.''
लेकिन इस फ़िल्म को बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?
इस सवाल के जवाब में गौरव कहते हैं, ''अमूमन शहरों में रहने वाले एक बड़े वर्ग को लगता है कि जात-पात का भेदभाव अब रह नहीं गया है, ये सब गुज़रे जमाने की बात हो गई लेकिन ऐसा नहीं है. देश के बहुत से हिस्सों में अब भी इस तरह का भेदभाव कायम है.''
इसी आर्टिकल 15 के बारे में सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वक़ील अवनि बंसल कहती हैं कि संविधान समानता का अधिकार देता है.
संविधान की रचना ही इस आधार पर की गई है कि देश के किसी नागरिक के साथ भेदभाव न हो लेकिन यह सच्चाई है कि संविधान में लिखित तथ्यों का ज़मीनी स्तर पर पालन नहीं हो पाता.
अवनि मानती हैं कि भले ही क़ानून कुछ भी कहे लेकिन उसे ज़मीनी स्तर पर लागू कराने की ज़िम्मेदारी प्रशासन की है और ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्रशासन इसका सख़्ती से पालन करवाए.
ऊना में दलितों की पिटाई. देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों की बारात रोकने और मुसलमानों के साथ गाय को लेकर हुई मारपीट. ऐसी घटनाओं को याद करें तो आप पाएंगे कि आर्टिकल 15 को बार-बार याद रखने की ज़रूरत क्यों है?
आर्टिकल 15 के ट्रेलर के कुछ दृश्य साल 2014 में बदायूं के कटरा शहादतगंज गांव में दो चचेरी बहनों की मौत से जुड़े हुए लगते हैं.
इस मामले में दो चचेरी बहनों के शव पेड़ से लटके मिले थे. पहले गैंग रेप के बाद हत्या की बात कही गई, फिर कहा गया कि दोनों बहनों ने आत्महत्या कर ली. कई बार ये भी बयान आया कि बच्चियों के पिता ने उनकी हत्या कर दी.
ट्रेलर में आयुष्मान खुराना भेदभाव ख़त्म करने की बात करते हुए नज़र आते हैं.
ये फ़िल्म 28 जून को रिलीज़ होगी लेकिन कुछ लोगों ने ट्रेलर पर आपत्ति जताना शुरू कर दिया है. वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल का मानना है कि इस तरह की फ़िल्मों से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.
दिलीप मंडल कहते हैं, ''ये एंटी-कास्ट फ़िल्म नहीं है बल्कि जाति को लेकर जो समाज में सालों से चली आ रही धारणाएं हैं ये फ़िल्म उन्हीं को पुष्ट करती है. यह फ़िल्म मानती है कि दलितों को आज भी अपने उद्धार के लिए एक मुक्ति दाता की ज़रूरत है और ये काम दलित ख़ुद नहीं कर सकते. फ़िल्म में यह उद्धारकर्ता एक ब्राह्मण आईपीएस है.''
दिलीप कहते हैं, ''किसी भी समाज में परिवर्तन आंतरिक तौर पर होता है, उसे बाहर से थोपा नहीं जा सकता और यह माना जाना चाहिए कि दलित अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं और परिवर्तन हो रहा है. ये फ़िल्म चल रही लड़ाई को पीछे ही ले जाएगी.''
लेकिन गौरव फ़िल्म को लेकर अभी किसी भी तरह की राय बना लेने को जल्दबाज़ी कहते हैं. उनका कहना है कि ट्रेलर किसी भी फ़िल्म का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा होता है, उसके आधार पर पूरी फ़िल्म की कल्पना कर लेना सही नहीं.
अब फ़िल्म इस सोच को आगे ले जाएगी या वाकई 'फ़र्क़' लाने में कामयाब होगी ये तो 28 तारीख़ के बाद ही तय हो पाएगा. पर जैसा कि फ़िल्म ये दावा करती है कि यह सत्य घटनाओं पर आधारित है तो आइए आपको इस फ़िल्म के एक सीन के साथ छोड़ जाते हैं. ताकि आप तय कर सकें कि ट्रेलर वाक़ई सच के क़रीब है?
फ़िल्म के एक दृश्य में आयुष्मान एक अधिकारी से बैठकर बात कर रहे हैं.
"सर ये तीन लड़कियां अपनी दिहाड़ी में सिर्फ़ तीन रुपए अधिक मांग रही थींसिर्फ़ तीन रुपए...
जो मिनरल वाटर आप पी रहे हैं, उसके दो या तीन घूंट के बराबर
उनकी इस ग़लती की वजह से उनका रेप हो गया सर
उनको मारकर पेड़ पर टांग दिया गया ताकि पूरी ज़ात को उनकी औक़ात याद रहे."
आर्टिकल 15 फ़िल्म के सह-लेखक गौरव सोलंकी ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''यह फ़िल्म सिर्फ़ एक घटना पर आधारित नहीं है. हर रोज़ कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है और ये फ़िल्म उन सभी घटनाओं को समाहित करती है.''
लेकिन इस फ़िल्म को बनाने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?
इस सवाल के जवाब में गौरव कहते हैं, ''अमूमन शहरों में रहने वाले एक बड़े वर्ग को लगता है कि जात-पात का भेदभाव अब रह नहीं गया है, ये सब गुज़रे जमाने की बात हो गई लेकिन ऐसा नहीं है. देश के बहुत से हिस्सों में अब भी इस तरह का भेदभाव कायम है.''
Tuesday, May 28, 2019
मोदी की केमिस्ट्री की मिस्ट्री क्यों नहीं समझ पाए गणितज्ञ लिबरल बुद्धिजीवी?
इस पर अजय सिंह कहते हैं, "देखिए संविधान में संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए, ऐसी स्थिति तो अभी नहीं है. तो इसके लिए सरकार कैसे कुछ कर
पाएगी, मुझे लगता है कि इस दिशा में तो अभी कुछ नहीं हो सकता."
रशीद किदवई ये भी कहते हैं कि बीजेपी कोई भी बड़ा फ़ैसला लेने से पहले काफ़ी सोच विचार करेगी, क्योंकि वह जनमानस का ख़याल रखकर ही आगे बढ़ेगी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
मोदी और उनके साथी जिसे 'खान मार्केट गैंग' या 'लुटिएंस इंटेलेक्चुअल्स' कहते हैं, वह तबका ज़रूर सोच रहा होगा कि उसमें 'रॉ विज़्डम' की कितनी कमी है. जीते हुए मोदी ने दोबारा प्रधानमंत्री बनने से पहले, काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद इस राज़ से पर्दा उठाया है कि लिबरल राजनीतिक विश्लेषक क्यों नाकाम हुए.
विजेता मोदी ने कहा, "चुनाव परिणाम गणित होता है. पिछले चुनाव अंकगणित के दायरे में चले होंगे लेकिन 2014 का चुनाव हो, 2017 (यूपी विधानसभा) का, या फिर 2019 का. इस देश के राजनीतिक विश्लेषकों को मानना होगा कि अंकगणित के ऊपर केमिस्ट्री होती है. समाज शक्ति की केमिस्ट्री, संकल्प शक्ति की केमिस्ट्री कई बार अंकगणित को परास्त कर देती है."
हार्वर्ड बनाम हार्डवर्क वाली अपनी सोच को आगे बढ़ाते हुए नरेंद्र मोदी ने हार्वर्ड वालों के जले पर नमक छिड़का, "तीन-तीन चुनावों के बाद पॉलिटिकल पंडित नहीं समझे, तो इसका यही मतलब है कि उनकी सोच बीसवीं सदी वाली है जो अब किसी काम की नहीं है. जिन लोगों की सीवी 50 पेज की होगी, इतना पढ़े-लिखे हैं, इतनी डिग्रियां हैं, इतने पेपर लिखे हैं, उनसे ज़्यादा समझदार तो ज़मीन से जुड़ा हुआ गरीब आदमी है."
जो जीता वही सिकंदर, मारे सो मीर, विजेता ही इतिहास लिखता है... ऐसे मुहावरे हम सब जानते हैं, मोदी एक अजेय नेता की तरह बात कर रहे हैं, तार्किक विश्लेषण करने की कोशिश करने वालों को वे भावनाओं की राजनीति से फ़िलहाल पीट चुके हैं.
ये अलग बात है कि उन्होंने अपनी थ्योरी को सही साबित करने के लिए यूपी विधानसभा चुनाव का ज़िक्र तो किया लेकिन दिल्ली और बिहार की हार को सफ़ाई से गोल कर गए.
पिछले चुनावों के आंकड़े, राज्यवार विश्लेषण, नए बने गठबंधन और कृषि संकट जैसे ठोस मुद्दों का असर, इन सबका तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण गणित था. यहां तक कि बीजेपी के समर्थक समझे जाने वाले पत्रकार भी तार्किक विश्लेषण के बाद यही कह रहे थे कि सीटें कुछ घटेंगी, बढ़ेंगी नहीं. यह बात ग़लत साबित हुई, गणित पिट गया.
अब बात केमिस्ट्री की, जिसे मापा नहीं जा सकता, जिसे तर्क से नहीं समझा जा सकता, जिसका वैज्ञानिक विश्लेषण कठिन है, ये चीज़ें हैं देशभक्ति की भावना, भगवत भक्ति का पुण्य प्रताप, घर में घुसकर मारा जैसे मुहावरों का असर, बदला लेने और दुश्मन को डरा देने के बाद ताल ठोकने का सुख, इनके असर को कोई विश्लेषक कैसे मापेगा?
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने पुलवामा और बालाकोट की घटना से काफ़ी पहले साफ़ शब्दों में कहा था, "चुनाव काम से नहीं, भावनात्मक मुद्दों से जीते जाते हैं."
विकास नरेंद्र मोदी और अमित शाह के चुनावी भाषणों में फुटनोट की ही तरह रहा, ऐसा नहीं है कि उनके पास गिनाने के लिए उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास योजना, जन-धन योजना, किसान सम्मान निधि जैसी चीज़ें नहीं थीं, लेकिन उनका ज़्यादा ज़ोर पाकिस्तान/मुसलमान, देश की सुरक्षा, राष्ट्र का गौरव, भारत माता की जय और कांग्रेस की ख़ानदानी राजनीति से हुए नुक़सान पर केंद्रित रहा.
जनभावना को समझने और उसका राजनीतिक दोहन करने के मामले में नरेंद्र इतने योग्य निकले कि बुद्धिवादी, तर्कवादी और वैज्ञानिक सोच रखने का दम भरने वाले लकीर पीटते रह गए, फ़ैक्ट चेक करने वाले पत्रकारों की ट्रेनिंग 'इमोशन चेक' करने की नहीं रही है. जनता के मूड को भांपने का हुनर शायद उन्हें नए सिरे से सीखना होगा.
लोग खुलेआम कह रहे थे कि रोज़गार नहीं है लेकिन वोट तो मोदी जी को दूंगा, आवारा गाय-बैल खेत चर रहे हैं लेकिन वोट मोदी जी को दूंगा, नोटबंदी से बहुत नुकसान हुआ लेकिन वोट मोदी जी को दूंगा... इन आवाज़ों को ज़्यादातर पत्रकारों ने सुना लेकिन वे इससे यह मतलब नहीं निकाल पाए कि बीजेपी को 300 से ज़्यादा सीटें मिलेंगी.
वे क्यों नहीं समझ पाए? इसलिए कि ज़्यादातर पत्रकार ऐसे लोगों को परंपरागत 'मोदी भक्त' मानते रहे जो उनकी नज़र में पहले से कमिटेड वोटर थे, इन्हें नया वोटर मानने से लिबरल मीडिया ने इनकार कर दिया, एंटी इनकंबेसी का तर्क दिया गया, महागठबंधन को दलित+पिछड़े+मुसलमान= निश्चित जीत मानने की गलती गणित पर डटे सभी पत्रकारों से हुई. कहा गया कि मोदी यूपी के नुकसान की भरपाई बंगाल और ओडिशा से नहीं कर पाएंगे.
इसी तरह छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, झारखंड जैसे सभी राज्यों में बीजेपी की सीटों में कमी आने को एक ठोस तर्क माना गया, खास तौर पर उन राज्यों में जहां कुछ ही महीने पहले बीजेपी विधानसभा चुनाव हारी थी, लेकिन इन सभी राज्यों में मोदी के नाम पर लड़ रहे उम्मीदवारों ने 2014 से ज़्यादा सीटें बटोर लीं.
रशीद किदवई ये भी कहते हैं कि बीजेपी कोई भी बड़ा फ़ैसला लेने से पहले काफ़ी सोच विचार करेगी, क्योंकि वह जनमानस का ख़याल रखकर ही आगे बढ़ेगी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
ख़ुद को तार्किक, पढ़ा-लिखा और समझदार
मानने वाले पत्रकारों-विश्लेषकों-बुद्धिजीवियों को नरेंद्र मोदी की जीत ने
सकते में डाल दिया है. मोदी को मिली इस दूसरी जीत को वे चुनाव नतीजों के आने से पहले बिल्कुल नहीं भांप पाए.
राजनीति अनिश्चित को निश्चित बनाने का खेल है, मोदी-शाह की जोड़ी ने यह कारनामा कर दिखाया है. लिबरल,
मध्यमार्गी, वामपंथी या सेक्युलर धारा के पत्रकार सही भविष्यवाणी करने में
अपनी नाकामी को लेकर सदमे में हैं मानो ऐसा पहली बार हुआ हो. लेकिन यह सच
नहीं है, 2004 के 'इंडिया शाइनिंग' वाले चुनाव में भी उन्हें नतीजे की भनक
नहीं लगी थी, और भी कई मिसालें हैं. मोदी और उनके साथी जिसे 'खान मार्केट गैंग' या 'लुटिएंस इंटेलेक्चुअल्स' कहते हैं, वह तबका ज़रूर सोच रहा होगा कि उसमें 'रॉ विज़्डम' की कितनी कमी है. जीते हुए मोदी ने दोबारा प्रधानमंत्री बनने से पहले, काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद इस राज़ से पर्दा उठाया है कि लिबरल राजनीतिक विश्लेषक क्यों नाकाम हुए.
विजेता मोदी ने कहा, "चुनाव परिणाम गणित होता है. पिछले चुनाव अंकगणित के दायरे में चले होंगे लेकिन 2014 का चुनाव हो, 2017 (यूपी विधानसभा) का, या फिर 2019 का. इस देश के राजनीतिक विश्लेषकों को मानना होगा कि अंकगणित के ऊपर केमिस्ट्री होती है. समाज शक्ति की केमिस्ट्री, संकल्प शक्ति की केमिस्ट्री कई बार अंकगणित को परास्त कर देती है."
हार्वर्ड बनाम हार्डवर्क वाली अपनी सोच को आगे बढ़ाते हुए नरेंद्र मोदी ने हार्वर्ड वालों के जले पर नमक छिड़का, "तीन-तीन चुनावों के बाद पॉलिटिकल पंडित नहीं समझे, तो इसका यही मतलब है कि उनकी सोच बीसवीं सदी वाली है जो अब किसी काम की नहीं है. जिन लोगों की सीवी 50 पेज की होगी, इतना पढ़े-लिखे हैं, इतनी डिग्रियां हैं, इतने पेपर लिखे हैं, उनसे ज़्यादा समझदार तो ज़मीन से जुड़ा हुआ गरीब आदमी है."
जो जीता वही सिकंदर, मारे सो मीर, विजेता ही इतिहास लिखता है... ऐसे मुहावरे हम सब जानते हैं, मोदी एक अजेय नेता की तरह बात कर रहे हैं, तार्किक विश्लेषण करने की कोशिश करने वालों को वे भावनाओं की राजनीति से फ़िलहाल पीट चुके हैं.
ये अलग बात है कि उन्होंने अपनी थ्योरी को सही साबित करने के लिए यूपी विधानसभा चुनाव का ज़िक्र तो किया लेकिन दिल्ली और बिहार की हार को सफ़ाई से गोल कर गए.
पिछले चुनावों के आंकड़े, राज्यवार विश्लेषण, नए बने गठबंधन और कृषि संकट जैसे ठोस मुद्दों का असर, इन सबका तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण गणित था. यहां तक कि बीजेपी के समर्थक समझे जाने वाले पत्रकार भी तार्किक विश्लेषण के बाद यही कह रहे थे कि सीटें कुछ घटेंगी, बढ़ेंगी नहीं. यह बात ग़लत साबित हुई, गणित पिट गया.
अब बात केमिस्ट्री की, जिसे मापा नहीं जा सकता, जिसे तर्क से नहीं समझा जा सकता, जिसका वैज्ञानिक विश्लेषण कठिन है, ये चीज़ें हैं देशभक्ति की भावना, भगवत भक्ति का पुण्य प्रताप, घर में घुसकर मारा जैसे मुहावरों का असर, बदला लेने और दुश्मन को डरा देने के बाद ताल ठोकने का सुख, इनके असर को कोई विश्लेषक कैसे मापेगा?
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने पुलवामा और बालाकोट की घटना से काफ़ी पहले साफ़ शब्दों में कहा था, "चुनाव काम से नहीं, भावनात्मक मुद्दों से जीते जाते हैं."
विकास नरेंद्र मोदी और अमित शाह के चुनावी भाषणों में फुटनोट की ही तरह रहा, ऐसा नहीं है कि उनके पास गिनाने के लिए उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास योजना, जन-धन योजना, किसान सम्मान निधि जैसी चीज़ें नहीं थीं, लेकिन उनका ज़्यादा ज़ोर पाकिस्तान/मुसलमान, देश की सुरक्षा, राष्ट्र का गौरव, भारत माता की जय और कांग्रेस की ख़ानदानी राजनीति से हुए नुक़सान पर केंद्रित रहा.
जनभावना को समझने और उसका राजनीतिक दोहन करने के मामले में नरेंद्र इतने योग्य निकले कि बुद्धिवादी, तर्कवादी और वैज्ञानिक सोच रखने का दम भरने वाले लकीर पीटते रह गए, फ़ैक्ट चेक करने वाले पत्रकारों की ट्रेनिंग 'इमोशन चेक' करने की नहीं रही है. जनता के मूड को भांपने का हुनर शायद उन्हें नए सिरे से सीखना होगा.
लोग खुलेआम कह रहे थे कि रोज़गार नहीं है लेकिन वोट तो मोदी जी को दूंगा, आवारा गाय-बैल खेत चर रहे हैं लेकिन वोट मोदी जी को दूंगा, नोटबंदी से बहुत नुकसान हुआ लेकिन वोट मोदी जी को दूंगा... इन आवाज़ों को ज़्यादातर पत्रकारों ने सुना लेकिन वे इससे यह मतलब नहीं निकाल पाए कि बीजेपी को 300 से ज़्यादा सीटें मिलेंगी.
वे क्यों नहीं समझ पाए? इसलिए कि ज़्यादातर पत्रकार ऐसे लोगों को परंपरागत 'मोदी भक्त' मानते रहे जो उनकी नज़र में पहले से कमिटेड वोटर थे, इन्हें नया वोटर मानने से लिबरल मीडिया ने इनकार कर दिया, एंटी इनकंबेसी का तर्क दिया गया, महागठबंधन को दलित+पिछड़े+मुसलमान= निश्चित जीत मानने की गलती गणित पर डटे सभी पत्रकारों से हुई. कहा गया कि मोदी यूपी के नुकसान की भरपाई बंगाल और ओडिशा से नहीं कर पाएंगे.
इसी तरह छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, झारखंड जैसे सभी राज्यों में बीजेपी की सीटों में कमी आने को एक ठोस तर्क माना गया, खास तौर पर उन राज्यों में जहां कुछ ही महीने पहले बीजेपी विधानसभा चुनाव हारी थी, लेकिन इन सभी राज्यों में मोदी के नाम पर लड़ रहे उम्मीदवारों ने 2014 से ज़्यादा सीटें बटोर लीं.
Wednesday, May 15, 2019
चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम
अशोक आज़ाद कहते हैं, "नीतीश कुमार विपक्षी नेताओं को जातिवादी कहते हैं
लेकिन आपको नालंदा में उनका जातिवाद नज़र आएगा. यहां की सात विधानसभा
सीटों में चार उनकी अपनी जाति का है, सांसद अपनी ही जाति का है, राज्यसभा सासंद भी उनकी ही जाति का है."
हालांकि नीतीश कुमार की छवि सुशासन बाबू की और इलाके के लोग मानते हैं कि मुख्यमंत्री होने की वजह से ही इलाके में काफी काम हुए हैं, इस पर भी अशोक आज़ाद कहते हैं, "कैसा सुशासन. दिन दहाड़े हत्याएं हो रही हैं. एक अति पिछड़ा को दौड़ा-दौड़ा कर आठ गोली मारी गई है."
महागठबंधन के उम्मीदवार को आरजेडी के वोट बैंक का पूरा समर्थन मिलने का भरोसा है. यादवों की संख्या तीन लाख के करीब है, जिन्हें आरजेडी का मतदाता बताया जा रहा है. मुसलमानों की संख्या एक लाख 60 हजार है. मुसलमानों ने 2014 में नीतीश कुमार के पक्ष में भी वोट किया था.
लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि तब नीतीश कुमार बीजेपी के साथ नहीं थे. इस बार बीजेपी के साथ होने से मुसलमानों का समर्थन उन्हें मिल पाएगा, इसमें संदेह दिख रहा है.
नालांदा के युवा राजद जिला अध्यक्ष सुनील यादव कहते हैं, "महागठबंधन पांच पार्टियों का गठबंधन है और हम सब लोग एकजुट होकर आज़ाद जी को जिताने की कोशिशों में जुटे हैं."
लेकिन नीतीश कुमार के पक्ष में खास बात यह है कि सवर्ण और बनिया समुदाय को मिलाकर भी यहां तीन लाख के करीब मतदाता हैं जिनका समर्थन जनता दल यूनाइटेड के उम्मीदवार को मिल रहा है.
वहीं दूसरी ओर, महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में मांझी, रविदास और बेलदार जैसे समुदाय का समर्थन दिख रहा है, इन सबकी संख्या भी ढाई लाख के करीब है.
जातीय जोड़तोड़ और वोट बैंक में सेंध लगाने का काम चुनाव से ठीक पहले वाले दिन तक चलेगा. कौशलेंद्र कुमार के पास कम से कम दो चुनाव प्रबंधन करने का अनुभव है जबकि आज़ाद ने अभी राजनीतिक तौर पर पहला कदम भी रखा है.
कौशलेंद्र कुमार अनुभव के मामले में तो बीस हैं ही, साथ ही इलाके की सात विधानसभा में पांच में उनके विधायक हैं, लिहाज़ा चुनाव प्रचार भी ज़्यादा संगठित तौर पर दिख रहा है.
यह सीट नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा का सवाल भी है, लिहाज़ा वे इलाके में कहीं ज़्यादा समय देकर लोगों की नाराज़गी को दूर करने की कोशिशों में भी जुटे हैं. मोदी सरकार के उपलब्धियों और राष्ट्रवाद को भी मुद्दा बनाया जा रहा है.
इलाके में चुनावी सभा करने पहुंचे राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी महागठबंधन को मिलावटी बताते हुए कहा कि नालंदा को लोगों को नरेंद्र मोदी- नीतीश कुमार के नेतृत्व में भरोसा बनाए रखना चाहिए.
लेकिन नालंदा में सबसे बड़ा मुद्दा नीतीश कुमार ही हैं.
उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यही है कि नालंदा की पहचान नीतीश कुमार हैं, स्थानीय लोग मानते हैं कि नीतीश ने इलाके को पहचान दिलाई है, लिहाज़ा नाराज़गी के बाद भी वोट उन्हें ही करेंगे.
उनके अपने पैतृक गांव कल्याण बिगहा में एक युवा ने कहा, "बीस महीने जब उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ा था, तो हम लोगों को समझ ही नहीं आया था कि ये क्या हो गया. लेकिन ठीक है, वो जहां जाएंगे हमलोग उनके साथ ही हैं."
वहीं एक दूसरे युवा ने कहा, "नीतीश-मोदी जी राष्ट्रवाद और मज़बूत सरकार की बात कर रहे हैं, लेकिन बताइए युवाओं के लिए क्या कर रहे हैं. नौकरियां लगातार कम हो रही हैं और यह इनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है."
दूसरी ओर महागठबंधन की कोशिश नीतीश को उनके गढ़ में ही घेरने की है. यही वजह है कि इस सीट पर चुनाव प्रचार के लिए पहली बार तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव एक साथ निकले.
अपना चुनाव क्षेत्र काराकाट को छोड़कर उपेंद्र कुशवाहा ने भी यहां चुनावी सभाएं की हैं और मुकेश साहनी भी प्रचार कर रहे हैं. लेकिन इन सबके सामने चुनौती उस कि केले को भेदने की है जो नीतीश कुमार ने लव कुश साथ सवर्ण और अति पिछड़ा समुदाय को जोड़कर तैयार किया है.
नीतीश कुमार के पाला बदलने से यह दरका ज़रूर है लेकिन अभी भी मज़बूत दिख रहा है. एकंगरसराय में ढाबे चलाने वाले एक शख्स ने कहा, "कौशलेंद्र को लेकर यहां नाराज़गी तो है. वे हार भी सकते थे अगर महागठबंधन ने यहां कोई दमदार उम्मीदवार मैदान में उतारा होता तब."
हालांकि नीतीश कुमार की छवि सुशासन बाबू की और इलाके के लोग मानते हैं कि मुख्यमंत्री होने की वजह से ही इलाके में काफी काम हुए हैं, इस पर भी अशोक आज़ाद कहते हैं, "कैसा सुशासन. दिन दहाड़े हत्याएं हो रही हैं. एक अति पिछड़ा को दौड़ा-दौड़ा कर आठ गोली मारी गई है."
महागठबंधन के उम्मीदवार को आरजेडी के वोट बैंक का पूरा समर्थन मिलने का भरोसा है. यादवों की संख्या तीन लाख के करीब है, जिन्हें आरजेडी का मतदाता बताया जा रहा है. मुसलमानों की संख्या एक लाख 60 हजार है. मुसलमानों ने 2014 में नीतीश कुमार के पक्ष में भी वोट किया था.
लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि तब नीतीश कुमार बीजेपी के साथ नहीं थे. इस बार बीजेपी के साथ होने से मुसलमानों का समर्थन उन्हें मिल पाएगा, इसमें संदेह दिख रहा है.
नालांदा के युवा राजद जिला अध्यक्ष सुनील यादव कहते हैं, "महागठबंधन पांच पार्टियों का गठबंधन है और हम सब लोग एकजुट होकर आज़ाद जी को जिताने की कोशिशों में जुटे हैं."
लेकिन नीतीश कुमार के पक्ष में खास बात यह है कि सवर्ण और बनिया समुदाय को मिलाकर भी यहां तीन लाख के करीब मतदाता हैं जिनका समर्थन जनता दल यूनाइटेड के उम्मीदवार को मिल रहा है.
वहीं दूसरी ओर, महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में मांझी, रविदास और बेलदार जैसे समुदाय का समर्थन दिख रहा है, इन सबकी संख्या भी ढाई लाख के करीब है.
जातीय जोड़तोड़ और वोट बैंक में सेंध लगाने का काम चुनाव से ठीक पहले वाले दिन तक चलेगा. कौशलेंद्र कुमार के पास कम से कम दो चुनाव प्रबंधन करने का अनुभव है जबकि आज़ाद ने अभी राजनीतिक तौर पर पहला कदम भी रखा है.
कौशलेंद्र कुमार अनुभव के मामले में तो बीस हैं ही, साथ ही इलाके की सात विधानसभा में पांच में उनके विधायक हैं, लिहाज़ा चुनाव प्रचार भी ज़्यादा संगठित तौर पर दिख रहा है.
यह सीट नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा का सवाल भी है, लिहाज़ा वे इलाके में कहीं ज़्यादा समय देकर लोगों की नाराज़गी को दूर करने की कोशिशों में भी जुटे हैं. मोदी सरकार के उपलब्धियों और राष्ट्रवाद को भी मुद्दा बनाया जा रहा है.
इलाके में चुनावी सभा करने पहुंचे राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी महागठबंधन को मिलावटी बताते हुए कहा कि नालंदा को लोगों को नरेंद्र मोदी- नीतीश कुमार के नेतृत्व में भरोसा बनाए रखना चाहिए.
लेकिन नालंदा में सबसे बड़ा मुद्दा नीतीश कुमार ही हैं.
उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यही है कि नालंदा की पहचान नीतीश कुमार हैं, स्थानीय लोग मानते हैं कि नीतीश ने इलाके को पहचान दिलाई है, लिहाज़ा नाराज़गी के बाद भी वोट उन्हें ही करेंगे.
उनके अपने पैतृक गांव कल्याण बिगहा में एक युवा ने कहा, "बीस महीने जब उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ा था, तो हम लोगों को समझ ही नहीं आया था कि ये क्या हो गया. लेकिन ठीक है, वो जहां जाएंगे हमलोग उनके साथ ही हैं."
वहीं एक दूसरे युवा ने कहा, "नीतीश-मोदी जी राष्ट्रवाद और मज़बूत सरकार की बात कर रहे हैं, लेकिन बताइए युवाओं के लिए क्या कर रहे हैं. नौकरियां लगातार कम हो रही हैं और यह इनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है."
दूसरी ओर महागठबंधन की कोशिश नीतीश को उनके गढ़ में ही घेरने की है. यही वजह है कि इस सीट पर चुनाव प्रचार के लिए पहली बार तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव एक साथ निकले.
अपना चुनाव क्षेत्र काराकाट को छोड़कर उपेंद्र कुशवाहा ने भी यहां चुनावी सभाएं की हैं और मुकेश साहनी भी प्रचार कर रहे हैं. लेकिन इन सबके सामने चुनौती उस कि केले को भेदने की है जो नीतीश कुमार ने लव कुश साथ सवर्ण और अति पिछड़ा समुदाय को जोड़कर तैयार किया है.
नीतीश कुमार के पाला बदलने से यह दरका ज़रूर है लेकिन अभी भी मज़बूत दिख रहा है. एकंगरसराय में ढाबे चलाने वाले एक शख्स ने कहा, "कौशलेंद्र को लेकर यहां नाराज़गी तो है. वे हार भी सकते थे अगर महागठबंधन ने यहां कोई दमदार उम्मीदवार मैदान में उतारा होता तब."
Monday, April 22, 2019
كيف ساعد مذاق الشاي في تحقيق ثروة طائلة؟
عندما تزور أي منزل في بريطانيا ستجد على الأرجح داخل المطبخ علبة من شاي يوركشاير، الذي يعد ثاني أشهر منتج
للشاي في بريطانيا بعد "بي جي تيبس"، بإنتاج وصل إلى أكثر من 5.5 مليار كيس
شاي عام 2018.
وخلال العام الماضي، ارتفعت مبيعات الشركة بشكل كبير
بعد ظهور عدد من أبرز المشاهير بمقاطعة يوركشاير في حملتها الإعلانية
الأخيرة، ومن بينهم السير مايكل باركينسون، وأعضاء فرقة كايزر تشيفز للروك، والشقيقان أليستر براونلي وجوني براونلي الحاصلان على ميداليات أولمبية في
سباق الألعاب الثلاثية "ترايثيلون". لكن ما السبب في انتشار شاي يوركشاير على نطاق واسع؟ تقول ليزلي وايلد، رئيسة شركة "بتيز آند تايلورز أوف هاروغيت"، وهي الشركة الأم لهذه العلامة التجارية، إن السبب هو أن مذاق الشاي "جيد للغاية".
وتضيف: "لدينا فريق يكرس جهودا ضخمة لتذوق آلاف الأصناف من الشاي كل يوم حتى نضمن أننا نقدم الأفضل دائما، كما أن التوليفة التي ننتجها تأخذ في الاعتبار نوعية الماء المستخدم في عمل الشاي في المنازل".
ويعد شاي يوركشاير هو المنتج الأشهر لهذه المجموعة، التي تملك أيضا سلسلة "تايلرز أوف هاروغيت" للقهوة والشاي، وكذلك مقاهي بتيز الشهيرة.
وأسس المقهى المهاجر السويسري فردريك بلمونت، الذي جاء إلى إنجلترا لتعزيز حياته المهنية بعد أن عمل في مخابز ومحال للحلوى في سويسرا وفرنسا.
وتقول ليزلي وايلد، وهي زوجة جوناثان، ابن شقيق بلمونت، إن مؤسس المجموعة ربما حط الرحال في يوركشاير عن طريق الصدفة. وتضيف: "وصل بلمونت إلى لندن ليكتشف أنه فقد عنوان الوجهة التي كان يجب أن يذهب إليها، وكان كل ما تذكره هو أن المكان الذي يقصده يشبه في نطقه كلمة براتفورست (وهو نوع من النقانق الألمانية)، فأشار إليه أحد المارة بالتوجه بالقطار إلى مدينة برادفورد بمقاطعة يوركشاير."
وسرعان ما ذاع صيت مقهى "بتيز"، المتخصص في تقديم أنواع الكعك عالي الجودة، وافتتح خمسة مقاهي إضافية في يوركشاير لتقديم الشاي التقليدي، كما ينظم دورات للطهي، فضلا عن بيع الهدايا على شبكة الإنترنت.
وفي عام 1962، تخصصت الشركة أكثر في الشاي بشراء محال "تايلورز أوف هاروغيت" للشاي والقهوة والتي تباع منتجاتها اليوم في المحال الكبرى بمختلف أنحاء المملكة المتحدة وخارجها.
وفي أواخر الستينيات من القرن الماضي، بدأت ليزلي وايلد العمل لبعض الوقت في شركة أسرة زوجها، بينما كانت تتدرب في مجال المحاماة، حتى التحقت بالعمل الكامل بالشركة عام 1979.
وتقول ليزلي إن هذه الوظيفة تناسبها تماما، مشيرة إلى أنها قد استفادت أيضا مما تعلمته في المحاماة. وكان أول منصب تتولاه رسميا في الشركة هو العمل كمديرة للتصدير، وتشير إلى أن ابتكار نوع من كعك الفاكهة للبيع بالخارج كان من بين أولى المهام التي أوكلت إليها.
وتتذكر ذلك قائلة: "كنت أحب الخبز والطهي، وهو ما حفزني على ابتكار وصفات الكعك وشكل العلب التي تحويها. ثم كان عليّ السفر خارج البلاد للتسويق لها".
وفي عام 1996، تولى جوناثان وايلد منصب المدير التنفيذي ورئيس مجموعة "بتيز آند تايلورز أوف هاروغيت" ليواصل مسيرة والده، فيكتور. وكانت الخطوة الأولى لجوناثان هي توحيد منتجات الشركة، بعدما شعر بأنها بدأت تتشتت في اتجاهات مختلفة.
تقول ليزلي وايلد: "كنا نعمل في أشياء بعيدة عن العمل الرئيسي للشركة، فكنا نعمل في إنتاج الحلوى، سواء المخبوزة أو المثلجة، وبيعها للمحال التجارية. لقد تشتتنا كثيرا، وكان يجب أن نعود إلى بؤرة عملنا".
كما قرر وايلد إضفاء ملمح جديد لمقاهي بتيز التي كانت قد فقدت شكلها التقليدي.
تقول ليزلي وايلد: "كانت الشركة قد فقدت السمة التي تميزها، ومن ثم بدأنا نعود إلى الأباريق الفضية وصواني الكعك التقليدية والأشياء التي يراها من يقصد مقاهي بتيز اليوم ولا يدرك أنها كادت تغيب عن مقاهينا للأبد".
استمر جوناثان وايلد في رئاسة الشركة حتى تقاعده عام 2011. ومنذ ذلك الحين، شهدت الشركة تغيرات كثيرة، من بينها إعادة هيكلة مجلس الإدارة حتى تتوزع السلطات بين أعضائه.
تقول ليزلي، التي تولت رئاسة الشركة في نفس العام الذي تقاعد فيه زوجها، إنها قررت أن تغير ثقافة الشركة فور توليها المسؤولية.
ورغم أن أسرة وايلد ما تزال المالكة للمجموعة، فإن المسؤوليات التنفيذية تتوزع بالتساوي بين أربعة مديرين، وهو أمر لم يكن معتادا بالشركة.
وتحقق مبيعات المجموعة، التي تتخذ من هاروغيت مقرا لها وتوظف 1400 شخص، نموا متزايدا. وفي عام 2017، بلغت عائدات الشركة 189.7 مليون جنيه استرليني، مقارنة بـ 173.6 مليون جنيه استرليني العام السابق، بينما قفزت الأرباح قبل الضريبة من 9.3 مليون جنيه استرليني إلى 16 مليون جنيه استرليني.
ورغم الأداء المتميز، تقول ليزلي إن الشركة ليست بمنأى عن التحديات التي تواجه السوق البريطاني، فقد انخفض إنفاق المستهلك على الشراء من المحال والمنافذ التقليدية لصالح التسوق عبر الإنترنت، وهو ما أدى لإفلاس الكثير من الأعمال في هذا المجال أو تقليص منافذها.
وتضيف: "لم يعد نفس العدد يقصد المنافذ الرئيسية، لكن ما يفيدنا هو أننا نقدم شيئا متميزا ومختلفا عما يقدمه غيرنا."
ا أن النظام خطى خطوة أخرى بمنع الاحتجاجات على
وأصدرت أديل أول ألبوماتها عام 2008، وتضمن عددا من الأغنيات الناجحة، وتصدر المبيعات حينها في بريطانيا.
واستمرت أديل في الغناء، لتحصد سلسلة من الجوائز، وتصدر ألبومها الثاني المسمى 21 أرقام الذي تصدر المبيعات في 30 دولة، من بينها بريطانيا والولايات المتحدة.
أما ألبومها الثالث المسمى 25 فقد حقق مبيعات قياسية، بنحو 800 ألف نسخة خلال الأسبوع الأول من إطلاقه، وأصبح الألبوم الأكثر مبيعا في عام 2015.
وفي مارس/ آذار الماضي، نُشرت صور للمغنية أديل، وهي تدخل استوديو تسجيل في مدينة نيويورك، ما أثار تكهنات بأنها تعمل على إصدار ألبوم جديد.
يقول سانشيز "في ميدان التحرير، منارة القاهرة حيث قام ملايين المصريين بإسقاط الحكومة السلطوية عام 2011 لم يعد هناك الآن إلا صور الرجل الذي ارتد على هذه الثورة".
ويضيف "الميدان الشهير أصبح الآن خاويا من المتظاهرين ومكدسا بصور عبدالفتاح السيسي الرئيس المصري، والملصقات التي تحض المواطنين على التصويت في الاستفتاء على التعديلات الدستورية، التي تسمح للسيسي بالبقاء في السلطة حتى العام 2030، وإحكام قبضته على القضاء".
ويستمر سانشيز قائلا "ليس هناك أي شك في أن النتيجة ستكون لصالح السيسي، لكن السؤال هو ما هي النسبة التي سيدعي أنه فاز بها"؟
ويتوقع سانشيز أن نسبة قبول التعديلات الدستورية "ستتراوح حول 97 في المئة وهي نفس النسبة التي جاءت بها نتائج الانتخابات الرئاسية في المرتين السابقتين اللتين فاز بهما السيسي" مضيفا أنه "بالنسبة للمعارضين فالاستفتاء يعد بمثابة معلم آخر كئيب في طريق عودة البلاد من الثورة إلى السلطوية، والذي استمر 8 سنوات".
وينقل سانشيز عن أيمن، وهو محاسب مصري يبلغ من العمر 32 عاما، قوله "لا أعرف إن كان هذا هو المسمار الأخير في نعش الثورة، أو المسمار الأخير في نعش النظام، أو المسمار الأخير في نعش الشعب".
ويشير سانشيز إلى أنه "في ظل الموجة الجديدة للربيع العربي في السودان والجزائر لا يغامر السيسي بأي فرصة حيث يمنع المظاهرات منذ سنوات بشكل حازم، كما أن النظام خطى خطوة أخرى بمنع الاحتجاجات على شبكة الإنترنت".
ونشرت الإندبندنت أونلاين تقريرا عن التطورات الأخيرة في ليبيا بعنوان "طرابلس تحت القصف الجوي وأمير الحرب يكثف الهجمات على الحكومة".
يقول التقرير إن اللواء السابق في جيش القذافي خليفة حفتر يصعد هجومه على العاصمة الليبية التي تسيطر عليها الحكومة المعترف بها دوليا باستخدام المقاتلات الجوية من طراز ميغ وهي المقاتلات سوفيتية الصنع القديمة التي كانت بحوذة الجيش الليبي إبان فترة حكم القذافي.
ويضيف التقرير أن السكان في طرابلس قالوا إن "بعض الغارات تمت باستخدام طائرات مسيرة، وإن صح ذلك فسيعني وجود تقنيات عسكرية جديدة لدى قوات حفتر الذي يحصل على الدعم من مصر والسعودية والإمارات".
ويوضح التقرير أن "الهجوم الذي شنه حفتر قبل نحو 3 أسابيع لم يتمكن حتى الآن من كسر دفاعات القوات الموالية للحكومة على خطوط القتال جنوب طرابلس رغم أن تكثيف الهجوم بشكل شرس خاصة بعد إقرار الرئيس الأمريكي دونالد ترامب لحفتر خلال مكالمة هاتفية الأسبوع الماضي".
ويختم التقرير بالإشارة إلى أن ترامب لم يتحدث إلى فايز السراج، رئيس الحكومة التي تعترف بها الأمم المتحدة، كما أن كلا من واشنطن وموسكو رفضتا الموافقة على مشروع قرار في مجلس الأمن يطالب بوقف القتال في ليبيا.
أما الديلي ميل، فنشرت تقريرا لمراسلها الرياضي لان لاديمان من ملعب كارديف سيتي عن مباراة فريق المدينة أمام ليفربول، والتي انتهت الأحد بفوز ليفربول بهدفين مقابل لاشيء وعودته لتصدر قمة الدوري الانجليزي الممتاز لكرة القدم (البريميير ليغ).
وأفرد لاديمان مقطعا من تقريره للتعليق على ركلة الجزاء المثيرة للجدل التي احتسبها الحكم مارتن أتكينسون لصلاح وسجل منها ليفربول هدفه الثاني.
ويقول لاديمان إن المشجعين اعترضوا على ركلة الجزاء وكذلك المدير الفني لكارديف الذي أمسك رأسه بطريقة غريبة، وأشار إلى أن اللعبة كانت بمثابة هدية من المدافع موريسون لصلاح قائلا إن اللعبة "كانت تستحق ركلة جزاء بوضوح، وهكذا كان احتضان موريسون لصلاح من الخلف قويا، ولم يكن باقيا إلا قبلة على خد صلاح بمناسبة احتفالات عيد الفصح".
ويضيف لاديمان "لقد أمسك موريسون بصلاح بوضوح مرتين على الأقل إحداهما كانت طويلة بما يكفي لأن يلاحظها الحكم أتكينسون الذي كان في موقع جيد ولم يتردد في احتسابها".
كما نشرت الجريدة تحليلا آخر في نفس الصفحة للحكم الدولي الانجليزي مارك كلاتينبيرغ تحت عنوان "حُكمي"، قال فيه "ربما تظاهر صلاح خلال الموسم بالسقوط للحصول على ركلات جزاء لكن الحكم مارتن اتكينسون كان مصيبا عندما احتسب ركلة جزاء له أمام كارديف. فقد أمسك موريسون بصلاح وكانت يداه تحيطان بجسده ثم رأسه قبل ان يسقط مهاجم ليفربول الذي سقط على الأرض، صحيح انه سقط بشكل غير معتاد، لكن اللعبة يجب ان تحتسب في أي مكان في الملعب، وليس لدى موريسون ومدربه نيل وارنوك أي مبرر للاحتجاج".
واستمرت أديل في الغناء، لتحصد سلسلة من الجوائز، وتصدر ألبومها الثاني المسمى 21 أرقام الذي تصدر المبيعات في 30 دولة، من بينها بريطانيا والولايات المتحدة.
أما ألبومها الثالث المسمى 25 فقد حقق مبيعات قياسية، بنحو 800 ألف نسخة خلال الأسبوع الأول من إطلاقه، وأصبح الألبوم الأكثر مبيعا في عام 2015.
وفي مارس/ آذار الماضي، نُشرت صور للمغنية أديل، وهي تدخل استوديو تسجيل في مدينة نيويورك، ما أثار تكهنات بأنها تعمل على إصدار ألبوم جديد.
تناولت صحف بريطانية عدة ملفات تهم
القاريء العربي وذلك في نسخها الورقية والرقمية بينها تأثير التعديلات الدستورية التي يجري الاستفتاء عليها في مصر على الوضع السياسي في البلاد،
وهجوم حفتر على طرابلس، علاوة على الجدل الذي أثير حول ركلة الجزاء التي احتسبها الحكم مارتن أتكينسون لصلاح في مبارة ليفربول أمام مضيفه كارديف
سيتي.
الديلي تليغراف نشرت تقريرا لراف سانشيز، مراسلها لشؤون الشرق
الأوسط من العاصمة المصرية القاهرة حول الاستفتاء على التعديلات الدستورية.يقول سانشيز "في ميدان التحرير، منارة القاهرة حيث قام ملايين المصريين بإسقاط الحكومة السلطوية عام 2011 لم يعد هناك الآن إلا صور الرجل الذي ارتد على هذه الثورة".
ويضيف "الميدان الشهير أصبح الآن خاويا من المتظاهرين ومكدسا بصور عبدالفتاح السيسي الرئيس المصري، والملصقات التي تحض المواطنين على التصويت في الاستفتاء على التعديلات الدستورية، التي تسمح للسيسي بالبقاء في السلطة حتى العام 2030، وإحكام قبضته على القضاء".
ويستمر سانشيز قائلا "ليس هناك أي شك في أن النتيجة ستكون لصالح السيسي، لكن السؤال هو ما هي النسبة التي سيدعي أنه فاز بها"؟
ويتوقع سانشيز أن نسبة قبول التعديلات الدستورية "ستتراوح حول 97 في المئة وهي نفس النسبة التي جاءت بها نتائج الانتخابات الرئاسية في المرتين السابقتين اللتين فاز بهما السيسي" مضيفا أنه "بالنسبة للمعارضين فالاستفتاء يعد بمثابة معلم آخر كئيب في طريق عودة البلاد من الثورة إلى السلطوية، والذي استمر 8 سنوات".
وينقل سانشيز عن أيمن، وهو محاسب مصري يبلغ من العمر 32 عاما، قوله "لا أعرف إن كان هذا هو المسمار الأخير في نعش الثورة، أو المسمار الأخير في نعش النظام، أو المسمار الأخير في نعش الشعب".
ويشير سانشيز إلى أنه "في ظل الموجة الجديدة للربيع العربي في السودان والجزائر لا يغامر السيسي بأي فرصة حيث يمنع المظاهرات منذ سنوات بشكل حازم، كما أن النظام خطى خطوة أخرى بمنع الاحتجاجات على شبكة الإنترنت".
ونشرت الإندبندنت أونلاين تقريرا عن التطورات الأخيرة في ليبيا بعنوان "طرابلس تحت القصف الجوي وأمير الحرب يكثف الهجمات على الحكومة".
يقول التقرير إن اللواء السابق في جيش القذافي خليفة حفتر يصعد هجومه على العاصمة الليبية التي تسيطر عليها الحكومة المعترف بها دوليا باستخدام المقاتلات الجوية من طراز ميغ وهي المقاتلات سوفيتية الصنع القديمة التي كانت بحوذة الجيش الليبي إبان فترة حكم القذافي.
ويضيف التقرير أن السكان في طرابلس قالوا إن "بعض الغارات تمت باستخدام طائرات مسيرة، وإن صح ذلك فسيعني وجود تقنيات عسكرية جديدة لدى قوات حفتر الذي يحصل على الدعم من مصر والسعودية والإمارات".
ويوضح التقرير أن "الهجوم الذي شنه حفتر قبل نحو 3 أسابيع لم يتمكن حتى الآن من كسر دفاعات القوات الموالية للحكومة على خطوط القتال جنوب طرابلس رغم أن تكثيف الهجوم بشكل شرس خاصة بعد إقرار الرئيس الأمريكي دونالد ترامب لحفتر خلال مكالمة هاتفية الأسبوع الماضي".
ويختم التقرير بالإشارة إلى أن ترامب لم يتحدث إلى فايز السراج، رئيس الحكومة التي تعترف بها الأمم المتحدة، كما أن كلا من واشنطن وموسكو رفضتا الموافقة على مشروع قرار في مجلس الأمن يطالب بوقف القتال في ليبيا.
أما الديلي ميل، فنشرت تقريرا لمراسلها الرياضي لان لاديمان من ملعب كارديف سيتي عن مباراة فريق المدينة أمام ليفربول، والتي انتهت الأحد بفوز ليفربول بهدفين مقابل لاشيء وعودته لتصدر قمة الدوري الانجليزي الممتاز لكرة القدم (البريميير ليغ).
وأفرد لاديمان مقطعا من تقريره للتعليق على ركلة الجزاء المثيرة للجدل التي احتسبها الحكم مارتن أتكينسون لصلاح وسجل منها ليفربول هدفه الثاني.
ويقول لاديمان إن المشجعين اعترضوا على ركلة الجزاء وكذلك المدير الفني لكارديف الذي أمسك رأسه بطريقة غريبة، وأشار إلى أن اللعبة كانت بمثابة هدية من المدافع موريسون لصلاح قائلا إن اللعبة "كانت تستحق ركلة جزاء بوضوح، وهكذا كان احتضان موريسون لصلاح من الخلف قويا، ولم يكن باقيا إلا قبلة على خد صلاح بمناسبة احتفالات عيد الفصح".
ويضيف لاديمان "لقد أمسك موريسون بصلاح بوضوح مرتين على الأقل إحداهما كانت طويلة بما يكفي لأن يلاحظها الحكم أتكينسون الذي كان في موقع جيد ولم يتردد في احتسابها".
كما نشرت الجريدة تحليلا آخر في نفس الصفحة للحكم الدولي الانجليزي مارك كلاتينبيرغ تحت عنوان "حُكمي"، قال فيه "ربما تظاهر صلاح خلال الموسم بالسقوط للحصول على ركلات جزاء لكن الحكم مارتن اتكينسون كان مصيبا عندما احتسب ركلة جزاء له أمام كارديف. فقد أمسك موريسون بصلاح وكانت يداه تحيطان بجسده ثم رأسه قبل ان يسقط مهاجم ليفربول الذي سقط على الأرض، صحيح انه سقط بشكل غير معتاد، لكن اللعبة يجب ان تحتسب في أي مكان في الملعب، وليس لدى موريسون ومدربه نيل وارنوك أي مبرر للاحتجاج".
Friday, March 8, 2019
لندن تمنح "حماية دبلوماسية" لبريطانية إيرانية معتقلة في طهران
أعلن وزير الخارجية البريطاني، جيريمي هنت، منح الحماية الدبلوماسية للبريطانية من أصول إيرانية، نازانين زاغاري
راتكليف، المسجونة في طهران.
وبذلك، تتحول قضيتها إلى نزاع قانوني رسمي بين بريطانيا وإيران. وتقضي نازانين عقوبة السجن 5 أعوام منذ 2016 بعد إدانتها بالتجسس، الذي تنفيه عن نفسها.
وقال هنت إن هذه الخطوة لا ينتظر منها تحقيق "الإفراج الفوري"، ولكنها "إجراء دبلوماسي مهم".
وأضاف أن هذا يبين للعالم كله أن "نازانين بريئة"، وينبه إيران إلى أن تصرفها "خاطئ تماماوتعد الحماية الدبلوماسية إجراء نادرا في القانون الدولي، تلجأ إليه الدولة لمساعدة أحد مواطنيها تعتقد أن حقوقه هضمت في دولة أخرى.
ويختلف الإجراء عن الحصانة الدبلوماسية التي تمنح للدبلوماسيين فتحميهم من المتابعة القضائية.
ويرى مراسل الشؤون الدبلوماسية في بي بي سي، جيمس لنديل، أن وضع نازانين القانوني الجديد لا يرغم إيران على معاملتها بطريقة مختلفة، ولكن يسهل على بريطانيا رفع قضيتها إلى الهيئات الدولية مثل الأمم المتحدة.
وقال هنت إنه قرار منح نازانين الحماية الدبلوماسية جاء بسبب معاملة إيران لها، وعدم توفير العلاج والمساعدة القانونية لها، مثلما تنص عليه القوانين الدولية.
ورحب ريتشارد راتكليف، الذي يقود حملة من أجل الإفراج عن زوجته، بهذه الخطوة التي "تعيطها الأمل" في العودة إلى بيتها.
ونوهت منظمات حقوقية، حضت الحكومة البريطانية على منح نازانين الحماية الدبلوماسية، بالقرار ووصفته بأنه "خطوة غاية في الأهمية" بالنسبة لها.
وتحمل نازانين، البالغة من العمر 41 عاما، الجنسيتين البريطانية والإيرانية، وكانت قبل اعتقالها مديرة برنامج في مؤسسة تومسون رويترز الخيرية وتقيم في لندن.
على مدار العام الماضي، حصلت المرأة في عدد من البلدان العربية على مكاسب عديدة، بعضها غير مسبوق، وذلك رغم
التحديات المختلفة التي تواجهها في المجتمعات العربية.
وتزامناً مع
اليوم العالمي للمرأة، في الثامن من مارس/آذار من كل عام، والذي يأتي هذا
العام تحت شعار "توازن أفضل، عالم أفضل"، احتفلت جمعيات وجماعات حقوقية
وكذلك مراقبون بهذه المكاسب. وتعكس هذه المكاسب، في معظمها، تغييرات هيكلية تبنّتها بعض الدول العربية من أجل تمكين المرأة، ومن أجل خلْق مجتمع يحقق التوازن بين الرجل والمرأة.
لكن في ذات الوقت، قوبلت بعض هذه التغيرات بانتقادات من جانب مَن وصفوها بأنها "شكلية" لتجميل الوجه السياسي لبعض الأنظمة العربية، أو مجرد "إملاءات" من تلك الأنظمة لا تمثل في الواقع أي تغير حقيقي في الثقافة المحافظة للدول العربية، التي لا تزال تُحجّم دور المرأة أو تقلل من شأنه.
كما انتقد البعض هذه التغيرات بوصفها "تأثرا بالغرب"، وتجاهلا للقيم والأعراف السائدة في المجتمعات العربية.
منذ أعلن الرئيس المصري عبد الفتاح السيسي 2017 عاما للمرأة المصرية، حصلت بعض النساء في مصر على مكاسب متعددة.
وتجسّد ذلك بشكل ملحوظ في زيادة نسبة تمثيل المرأة المصرية في المناصب التنفيذية، والتشريعية، والقضائية، كما استمر الاهتمام بتمكين المرأة في 2018 أيضا، ووصفت جريدة الأهرام المصرية ذلك العام بأنه "عام الانطلاق للمرأة المصرية".
وأشارت الصحيفة إلى أن ثماني سيدات كلفن، ولأول مرة في مصر، بشغل مناصب وزارية، كما عُينت أول امرأة قبطية في منصب محافظ، وعُينت خمس نساء في منصب نائبات للمحافظين، بالإضافة إلى قرارات بتعيين 77 قاضية، وأول مساعدة لوزير العدل.
كما شهد البرلمان المصري، لأول مرة في تاريخه، حصول المرأة على 15 في المئة من إجمالي عدد مقاعد البرلمان. وفي حال الموافقة على التعديلات الدستورية المقترحة، التي تقدم بها بعض نواب البرلمان، فإن هذه النسبة مرشحة للزيادة لتصل إلى 25 في المئة من المقاعد.
وترتبط معظم الأدوار الجديدة التي حصلت عليها المرأة في مصر بما يعرف بـ "استراتيجية التنمية المستدامة" التي أطلقها الرئيس السيسي عام 2016، والتي تعبر عن رؤية مستقبلية لمصر في عام 2030.
وفي ديسمبر / كانون أول الماضي، أشادت هيئة الأمم المتحدة للمرأة في مصر بتعيين رحمة خالد كأول مذيعة مصابة بمتلازمة "داون"، والتي ظهرت لأول مرة على شاشات شبكة "دي إم سي" التلفزيونية.
وفي مشهد طال انتظاره، أصبح للنساء السعوديات الحق في قيادة السيارة لأول مرة في تاريخ البلاد في الرابع والعشرين من يونيو/حزيران عام 2018، بعد اتخاذ قرار برفع الحظر عن قيادتهن للسيارات، وذلك في إطار حزمة من الإصلاحات الاجتماعية التي يتبناها ولي العهد السعودي محمد بن سلمان.
واعتُبر هذا التطور سَبقاً في تاريخ النساء السعوديات اللاتي لا يزلن يخضعن لسيطرة نظام وصاية الرجل على المرأة.
وفي الثالث والعشرين من فبراير/شباط الماضي، عين العاهل السعودي سلمان بن عبد العزيز، الأميرة ريما بنت بندر بن سلطان سفيرة للمملكة العربية في واشنطن، لتصبح أول امرأة سعودية تشغل هذا المنصب، خلفاً للأمير خالد بن سلمان، الذي عُيّن نائباً لوزير الدفاع.
وفي سبتمبر/أيلول الماضي، عُيّنت وئام الدخيل كأول مذيعة سعودية تقدم الأخبار على القناة الأولى السعودية.
وفي بداية الشهر الماضي، أصبحت هيلة الفراج أول معلقة رياضية في تاريخ المملكة العربية السعودية.
وفي البحرين، انتُخبت فوزية زينل كأول امرأة تتولى منصب رئيسة البرلمان في البلاد في ديسمبر/كانون أول الماضي، لتصبح الثالثة على مستوى الدول العربية، بعد تولي الإماراتية أمل القبيسي هذا المنصب عام 2015، والسورية هادية عباس في عام 2016.
وفي دولة الإمارات، وجّه رئيس الدولة الشيخ خليفة بن زايد آل نهيان برفع نسبة تمثيل المرأة الإماراتية في المجلس الوطني الاتحادي لتصل إلى 50 في المئة، وفقاً لصحيفة العين الإلكترونية الإماراتية.
وفي بعض دول المغرب العربي، شُرّعتْ قوانين عديدة لحفظ حقوق المرأة العربية وحمايتها. ومهدّت مثل هذه القوانين الطريق لتحقيق مزيد من الخطوات على صعيد التمكين.
وتبنّت المملكة المغربية في سبتمبر/أيلول الماضي قانون رقم "13-103" الخاص بمكافحة العنف ضد المرأة.
وقالت وزيرة التضامن والمرأة والأسرة والتنمية الاجتماعية في المغرب بسيمة الحقاوي، إن القانون ينص على "اعتبار العنف ضد المرأة، بسبب جنسها، سبباً من أسباب التشديد في العقوبات على الجاني"، وهو ما يعد "من الأبعاد الأساسية في هذا القانون"، نقلاً عن موقع البوابة الوطنية المغربية.
وفي نوفمبر/تشرين الثاني الماضي، صدّق مجلس الوزراء في تونس على مسودة قانون الأحوال الشخصية الذي يتضمن أحكاما بالمساواة في الميراث بين الرجل والمرأة، وستعرض الحكومة المشروع على البرلمان من أجل المصادقة عليه.
ووفقاً لجريدة العرب اللندنية، اعتمدت عدة إصلاحات تشريعية خاصة بقانون الأسرة في الجزائر الشهر الماضي، شملت "اعتماد قانون يكفل استقلالية الزوجة ماليًا كإحدى الوسائل القانونية للحدّ من الخلافات الزوجية في ما يخص أموال الزوجة، كما يضمن حماية أكثر للمرأة من الاستغلال المادي ويشجعها على السعي إلى العمل بالتوازي مع القوانين التي نصّت على المساواة بين الجنسين في شتى المجالات".
يقول حساب يحمل اسم "الشباب السعودي الحر" على موقع التواصل الاجتماعي تويتر: "تعيين الأميرة ريما بنِت بندر بن سطان سفيرة سعودية في واشنطن جاء لإيهام الغرب بمناصرة حقوق المرأة إثر تركيز المنظمات الحقوقية على مسألة فرار السعوديات المعنفات داخل المملكة، و كشف جرائم التعذيب المرتكبة بحق النساء الإصلاحيات".
أما موقع رصد الإخباري المعارض للحكومة المصرية، فقد نقل عن الناشطة الحقوقية نيفين ملك قولها: "السيسي يتعامل مع المرأة المصرية كأنها وسيلة يصل من خلالها إلى الحكم، خاصة وأنه يوهم الشعب أنها كان لها دور في التصويت في الانتخابات الرئاسية 2014".
كما وصفت قناة اللؤلؤة التلفزيونية المعارضة في البحرين انتخاب فوزية زينل لتشغل منصب رئيسة البرلمان في البلاد بأنه جاء "بدعم من الديوان الملكي".
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