Wednesday, May 15, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

अशोक आज़ाद कहते हैं, "नीतीश कुमार विपक्षी नेताओं को जातिवादी कहते हैं लेकिन आपको नालंदा में उनका जातिवाद नज़र आएगा. यहां की सात विधानसभा सीटों में चार उनकी अपनी जाति का है, सांसद अपनी ही जाति का है, राज्यसभा सासंद भी उनकी ही जाति का है."
हालांकि नीतीश कुमार की छवि सुशासन बाबू की और इलाके के लोग मानते हैं कि मुख्यमंत्री होने की वजह से ही इलाके में काफी काम हुए हैं, इस पर भी अशोक आज़ाद कहते हैं, "कैसा सुशासन. दिन दहाड़े हत्याएं हो रही हैं. एक अति पिछड़ा को दौड़ा-दौड़ा कर आठ गोली मारी गई है."
महागठबंधन के उम्मीदवार को आरजेडी के वोट बैंक का पूरा समर्थन मिलने का भरोसा है. यादवों की संख्या तीन लाख के करीब है, जिन्हें आरजेडी का मतदाता बताया जा रहा है. मुसलमानों की संख्या एक लाख 60 हजार है. मुसलमानों ने 2014 में नीतीश कुमार के पक्ष में भी वोट किया था.
लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि तब नीतीश कुमार बीजेपी के साथ नहीं थे. इस बार बीजेपी के साथ होने से मुसलमानों का समर्थन उन्हें मिल पाएगा, इसमें संदेह दिख रहा है.
नालांदा के युवा राजद जिला अध्यक्ष सुनील यादव कहते हैं, "महागठबंधन पांच पार्टियों का गठबंधन है और हम सब लोग एकजुट होकर आज़ाद जी को जिताने की कोशिशों में जुटे हैं."
लेकिन नीतीश कुमार के पक्ष में खास बात यह है कि सवर्ण और बनिया समुदाय को मिलाकर भी यहां तीन लाख के करीब मतदाता हैं जिनका समर्थन जनता दल यूनाइटेड के उम्मीदवार को मिल रहा है.
वहीं दूसरी ओर, महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में मांझी, रविदास और बेलदार जैसे समुदाय का समर्थन दिख रहा है, इन सबकी संख्या भी ढाई लाख के करीब है.
जातीय जोड़तोड़ और वोट बैंक में सेंध लगाने का काम चुनाव से ठीक पहले वाले दिन तक चलेगा. कौशलेंद्र कुमार के पास कम से कम दो चुनाव प्रबंधन करने का अनुभव है जबकि आज़ाद ने अभी राजनीतिक तौर पर पहला कदम भी रखा है.
कौशलेंद्र कुमार अनुभव के मामले में तो बीस हैं ही, साथ ही इलाके की सात विधानसभा में पांच में उनके विधायक हैं, लिहाज़ा चुनाव प्रचार भी ज़्यादा संगठित तौर पर दिख रहा है.
यह सीट नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा का सवाल भी है, लिहाज़ा वे इलाके में कहीं ज़्यादा समय देकर लोगों की नाराज़गी को दूर करने की कोशिशों में भी जुटे हैं. मोदी सरकार के उपलब्धियों और राष्ट्रवाद को भी मुद्दा बनाया जा रहा है.
इलाके में चुनावी सभा करने पहुंचे राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी महागठबंधन को मिलावटी बताते हुए कहा कि नालंदा को लोगों को नरेंद्र मोदी- नीतीश कुमार के नेतृत्व में भरोसा बनाए रखना चाहिए.
लेकिन नालंदा में सबसे बड़ा मुद्दा नीतीश कुमार ही हैं.
उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यही है कि नालंदा की पहचान नीतीश कुमार हैं, स्थानीय लोग मानते हैं कि नीतीश ने इलाके को पहचान दिलाई है, लिहाज़ा नाराज़गी के बाद भी वोट उन्हें ही करेंगे.
उनके अपने पैतृक गांव कल्याण बिगहा में एक युवा ने कहा, "बीस महीने जब उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ा था, तो हम लोगों को समझ ही नहीं आया था कि ये क्या हो गया. लेकिन ठीक है, वो जहां जाएंगे हमलोग उनके साथ ही हैं."
वहीं एक दूसरे युवा ने कहा, "नीतीश-मोदी जी राष्ट्रवाद और मज़बूत सरकार की बात कर रहे हैं, लेकिन बताइए युवाओं के लिए क्या कर रहे हैं. नौकरियां लगातार कम हो रही हैं और यह इनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है."
दूसरी ओर महागठबंधन की कोशिश नीतीश को उनके गढ़ में ही घेरने की है. यही वजह है कि इस सीट पर चुनाव प्रचार के लिए पहली बार तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव एक साथ निकले.
अपना चुनाव क्षेत्र काराकाट को छोड़कर उपेंद्र कुशवाहा ने भी यहां चुनावी सभाएं की हैं और मुकेश साहनी भी प्रचार कर रहे हैं. लेकिन इन सबके सामने चुनौती उस कि केले को भेदने की है जो नीतीश कुमार ने लव कुश साथ सवर्ण और अति पिछड़ा समुदाय को जोड़कर तैयार किया है.
नीतीश कुमार के पाला बदलने से यह दरका ज़रूर है लेकिन अभी भी मज़बूत दिख रहा है. एकंगरसराय में ढाबे चलाने वाले एक शख्स ने कहा, "कौशलेंद्र को लेकर यहां नाराज़गी तो है. वे हार भी सकते थे अगर महागठबंधन ने यहां कोई दमदार उम्मीदवार मैदान में उतारा होता तब."

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