Tuesday, May 28, 2019

मोदी की केमिस्ट्री की मिस्ट्री क्यों नहीं समझ पाए गणितज्ञ लिबरल बुद्धिजीवी?

इस पर अजय सिंह कहते हैं, "देखिए संविधान में संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए, ऐसी स्थिति तो अभी नहीं है. तो इसके लिए सरकार कैसे कुछ कर पाएगी, मुझे लगता है कि इस दिशा में तो अभी कुछ नहीं हो सकता."
रशीद किदवई ये भी कहते हैं कि बीजेपी कोई भी बड़ा फ़ैसला लेने से पहले काफ़ी सोच विचार करेगी, क्योंकि वह जनमानस का ख़याल रखकर ही आगे बढ़ेगी.
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ख़ुद को तार्किक, पढ़ा-लिखा और समझदार मानने वाले पत्रकारों-विश्लेषकों-बुद्धिजीवियों को नरेंद्र मोदी की जीत ने सकते में डाल दिया है. मोदी को मिली इस दूसरी जीत को वे चुनाव नतीजों के आने से पहले बिल्कुल नहीं भांप पाए.
राजनीति अनिश्चित को निश्चित बनाने का खेल है, मोदी-शाह की जोड़ी ने यह कारनामा कर दिखाया है. लिबरल, मध्यमार्गी, वामपंथी या सेक्युलर धारा के पत्रकार सही भविष्यवाणी करने में अपनी नाकामी को लेकर सदमे में हैं मानो ऐसा पहली बार हुआ हो. लेकिन यह सच नहीं है, 2004 के 'इंडिया शाइनिंग' वाले चुनाव में भी उन्हें नतीजे की भनक नहीं लगी थी, और भी कई मिसालें हैं.
मोदी और उनके साथी जिसे 'खान मार्केट गैंग' या 'लुटिएंस इंटेलेक्चुअल्स' कहते हैं, वह तबका ज़रूर सोच रहा होगा कि उसमें 'रॉ विज़्डम' की कितनी कमी है. जीते हुए मोदी ने दोबारा प्रधानमंत्री बनने से पहले, काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद इस राज़ से पर्दा उठाया है कि लिबरल राजनीतिक विश्लेषक क्यों नाकाम हुए.
विजेता मोदी ने कहा, "चुनाव परिणाम गणित होता है. पिछले चुनाव अंकगणित के दायरे में चले होंगे लेकिन 2014 का चुनाव हो, 2017 (यूपी विधानसभा) का, या फिर 2019 का. इस देश के राजनीतिक विश्लेषकों को मानना होगा कि अंकगणित के ऊपर केमिस्ट्री होती है. समाज शक्ति की केमिस्ट्री, संकल्प शक्ति की केमिस्ट्री कई बार अंकगणित को परास्त कर देती है."
हार्वर्ड बनाम हार्डवर्क वाली अपनी सोच को आगे बढ़ाते हुए नरेंद्र मोदी ने हार्वर्ड वालों के जले पर नमक छिड़का, "तीन-तीन चुनावों के बाद पॉलिटिकल पंडित नहीं समझे, तो इसका यही मतलब है कि उनकी सोच बीसवीं सदी वाली है जो अब किसी काम की नहीं है. जिन लोगों की सीवी 50 पेज की होगी, इतना पढ़े-लिखे हैं, इतनी डिग्रियां हैं, इतने पेपर लिखे हैं, उनसे ज़्यादा समझदार तो ज़मीन से जुड़ा हुआ गरीब आदमी है."
जो जीता वही सिकंदर, मारे सो मीर, विजेता ही इतिहास लिखता है... ऐसे मुहावरे हम सब जानते हैं, मोदी एक अजेय नेता की तरह बात कर रहे हैं, तार्किक विश्लेषण करने की कोशिश करने वालों को वे भावनाओं की राजनीति से फ़िलहाल पीट चुके हैं.
ये अलग बात है कि उन्होंने अपनी थ्योरी को सही साबित करने के लिए यूपी विधानसभा चुनाव का ज़िक्र तो किया लेकिन दिल्ली और बिहार की हार को सफ़ाई से गोल कर गए.
पिछले चुनावों के आंकड़े, राज्यवार विश्लेषण, नए बने गठबंधन और कृषि संकट जैसे ठोस मुद्दों का असर, इन सबका तार्किक और वैज्ञानिक विश्लेषण गणित था. यहां तक कि बीजेपी के समर्थक समझे जाने वाले पत्रकार भी तार्किक विश्लेषण के बाद यही कह रहे थे कि सीटें कुछ घटेंगी, बढ़ेंगी नहीं. यह बात ग़लत साबित हुई, गणित पिट गया.
अब बात केमिस्ट्री की, जिसे मापा नहीं जा सकता, जिसे तर्क से नहीं समझा जा सकता, जिसका वैज्ञानिक विश्लेषण कठिन है, ये चीज़ें हैं देशभक्ति की भावना, भगवत भक्ति का पुण्य प्रताप, घर में घुसकर मारा जैसे मुहावरों का असर, बदला लेने और दुश्मन को डरा देने के बाद ताल ठोकने का सुख, इनके असर को कोई विश्लेषक कैसे मापेगा?
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने पुलवामा और बालाकोट की घटना से काफ़ी पहले साफ़ शब्दों में कहा था, "चुनाव काम से नहीं, भावनात्मक मुद्दों से जीते जाते हैं."
विकास नरेंद्र मोदी और अमित शाह के चुनावी भाषणों में फुटनोट की ही तरह रहा, ऐसा नहीं है कि उनके पास गिनाने के लिए उज्ज्वला, प्रधानमंत्री आवास योजना, जन-धन योजना, किसान सम्मान निधि जैसी चीज़ें नहीं थीं, लेकिन उनका ज़्यादा ज़ोर पाकिस्तान/मुसलमान, देश की सुरक्षा, राष्ट्र का गौरव, भारत माता की जय और कांग्रेस की ख़ानदानी राजनीति से हुए नुक़सान पर केंद्रित रहा.
जनभावना को समझने और उसका राजनीतिक दोहन करने के मामले में नरेंद्र इतने योग्य निकले कि बुद्धिवादी, तर्कवादी और वैज्ञानिक सोच रखने का दम भरने वाले लकीर पीटते रह गए, फ़ैक्ट चेक करने वाले पत्रकारों की ट्रेनिंग 'इमोशन चेक' करने की नहीं रही है. जनता के मूड को भांपने का हुनर शायद उन्हें नए सिरे से सीखना होगा.
लोग खुलेआम कह रहे थे कि रोज़गार नहीं है लेकिन वोट तो मोदी जी को दूंगा, आवारा गाय-बैल खेत चर रहे हैं लेकिन वोट मोदी जी को दूंगा, नोटबंदी से बहुत नुकसान हुआ लेकिन वोट मोदी जी को दूंगा... इन आवाज़ों को ज़्यादातर पत्रकारों ने सुना लेकिन वे इससे यह मतलब नहीं निकाल पाए कि बीजेपी को 300 से ज़्यादा सीटें मिलेंगी.
वे क्यों नहीं समझ पाए? इसलिए कि ज़्यादातर पत्रकार ऐसे लोगों को परंपरागत 'मोदी भक्त' मानते रहे जो उनकी नज़र में पहले से कमिटेड वोटर थे, इन्हें नया वोटर मानने से लिबरल मीडिया ने इनकार कर दिया, एंटी इनकंबेसी का तर्क दिया गया, महागठबंधन को दलित+पिछड़े+मुसलमान= निश्चित जीत मानने की गलती गणित पर डटे सभी पत्रकारों से हुई. कहा गया कि मोदी यूपी के नुकसान की भरपाई बंगाल और ओडिशा से नहीं कर पाएंगे.
इसी तरह छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, झारखंड जैसे सभी राज्यों में बीजेपी की सीटों में कमी आने को एक ठोस तर्क माना गया, खास तौर पर उन राज्यों में जहां कुछ ही महीने पहले बीजेपी विधानसभा चुनाव हारी थी, लेकिन इन सभी राज्यों में मोदी के नाम पर लड़ रहे उम्मीदवारों ने 2014 से ज़्यादा सीटें बटोर लीं.

Wednesday, May 15, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

अशोक आज़ाद कहते हैं, "नीतीश कुमार विपक्षी नेताओं को जातिवादी कहते हैं लेकिन आपको नालंदा में उनका जातिवाद नज़र आएगा. यहां की सात विधानसभा सीटों में चार उनकी अपनी जाति का है, सांसद अपनी ही जाति का है, राज्यसभा सासंद भी उनकी ही जाति का है."
हालांकि नीतीश कुमार की छवि सुशासन बाबू की और इलाके के लोग मानते हैं कि मुख्यमंत्री होने की वजह से ही इलाके में काफी काम हुए हैं, इस पर भी अशोक आज़ाद कहते हैं, "कैसा सुशासन. दिन दहाड़े हत्याएं हो रही हैं. एक अति पिछड़ा को दौड़ा-दौड़ा कर आठ गोली मारी गई है."
महागठबंधन के उम्मीदवार को आरजेडी के वोट बैंक का पूरा समर्थन मिलने का भरोसा है. यादवों की संख्या तीन लाख के करीब है, जिन्हें आरजेडी का मतदाता बताया जा रहा है. मुसलमानों की संख्या एक लाख 60 हजार है. मुसलमानों ने 2014 में नीतीश कुमार के पक्ष में भी वोट किया था.
लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि तब नीतीश कुमार बीजेपी के साथ नहीं थे. इस बार बीजेपी के साथ होने से मुसलमानों का समर्थन उन्हें मिल पाएगा, इसमें संदेह दिख रहा है.
नालांदा के युवा राजद जिला अध्यक्ष सुनील यादव कहते हैं, "महागठबंधन पांच पार्टियों का गठबंधन है और हम सब लोग एकजुट होकर आज़ाद जी को जिताने की कोशिशों में जुटे हैं."
लेकिन नीतीश कुमार के पक्ष में खास बात यह है कि सवर्ण और बनिया समुदाय को मिलाकर भी यहां तीन लाख के करीब मतदाता हैं जिनका समर्थन जनता दल यूनाइटेड के उम्मीदवार को मिल रहा है.
वहीं दूसरी ओर, महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में मांझी, रविदास और बेलदार जैसे समुदाय का समर्थन दिख रहा है, इन सबकी संख्या भी ढाई लाख के करीब है.
जातीय जोड़तोड़ और वोट बैंक में सेंध लगाने का काम चुनाव से ठीक पहले वाले दिन तक चलेगा. कौशलेंद्र कुमार के पास कम से कम दो चुनाव प्रबंधन करने का अनुभव है जबकि आज़ाद ने अभी राजनीतिक तौर पर पहला कदम भी रखा है.
कौशलेंद्र कुमार अनुभव के मामले में तो बीस हैं ही, साथ ही इलाके की सात विधानसभा में पांच में उनके विधायक हैं, लिहाज़ा चुनाव प्रचार भी ज़्यादा संगठित तौर पर दिख रहा है.
यह सीट नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा का सवाल भी है, लिहाज़ा वे इलाके में कहीं ज़्यादा समय देकर लोगों की नाराज़गी को दूर करने की कोशिशों में भी जुटे हैं. मोदी सरकार के उपलब्धियों और राष्ट्रवाद को भी मुद्दा बनाया जा रहा है.
इलाके में चुनावी सभा करने पहुंचे राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी महागठबंधन को मिलावटी बताते हुए कहा कि नालंदा को लोगों को नरेंद्र मोदी- नीतीश कुमार के नेतृत्व में भरोसा बनाए रखना चाहिए.
लेकिन नालंदा में सबसे बड़ा मुद्दा नीतीश कुमार ही हैं.
उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यही है कि नालंदा की पहचान नीतीश कुमार हैं, स्थानीय लोग मानते हैं कि नीतीश ने इलाके को पहचान दिलाई है, लिहाज़ा नाराज़गी के बाद भी वोट उन्हें ही करेंगे.
उनके अपने पैतृक गांव कल्याण बिगहा में एक युवा ने कहा, "बीस महीने जब उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ा था, तो हम लोगों को समझ ही नहीं आया था कि ये क्या हो गया. लेकिन ठीक है, वो जहां जाएंगे हमलोग उनके साथ ही हैं."
वहीं एक दूसरे युवा ने कहा, "नीतीश-मोदी जी राष्ट्रवाद और मज़बूत सरकार की बात कर रहे हैं, लेकिन बताइए युवाओं के लिए क्या कर रहे हैं. नौकरियां लगातार कम हो रही हैं और यह इनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है."
दूसरी ओर महागठबंधन की कोशिश नीतीश को उनके गढ़ में ही घेरने की है. यही वजह है कि इस सीट पर चुनाव प्रचार के लिए पहली बार तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव एक साथ निकले.
अपना चुनाव क्षेत्र काराकाट को छोड़कर उपेंद्र कुशवाहा ने भी यहां चुनावी सभाएं की हैं और मुकेश साहनी भी प्रचार कर रहे हैं. लेकिन इन सबके सामने चुनौती उस कि केले को भेदने की है जो नीतीश कुमार ने लव कुश साथ सवर्ण और अति पिछड़ा समुदाय को जोड़कर तैयार किया है.
नीतीश कुमार के पाला बदलने से यह दरका ज़रूर है लेकिन अभी भी मज़बूत दिख रहा है. एकंगरसराय में ढाबे चलाने वाले एक शख्स ने कहा, "कौशलेंद्र को लेकर यहां नाराज़गी तो है. वे हार भी सकते थे अगर महागठबंधन ने यहां कोई दमदार उम्मीदवार मैदान में उतारा होता तब."