कर्नाटक पुलिस ने अपने 14 हज़ार जवानों को तीन महीने का वक्त दिया है. इस तीन महीने में उन्हें अपना मोटापा कम करना होगा.
अगर वो तय समय सीमा में फ़िट नहीं होते हैं तो उन्हें नौकरी से बर्ख़ास्त भी किया जा सकता है.
कर्नाटक
स्टेट रिजर्व पुलिस (केएसआरपी) ने अपने प्लाटून कमांडर को ऐसे पुलिस
कर्मियों की पहचान करने को कहा है जिनके वजन ज्यादा और पेट निकले हुए हैं.
केएसआरपी
के अतिरिक्त महानिदेशक भास्कर राव ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "छह महीने
पहले जवानों की शारीरिक जांच की गई थी, जिसमें उन्हें मधुमेह और वजन की
समस्या से होने वाली बीमारी का पता चला है. अगर वे अपने स्वास्थ्य पर ध्यान
नहीं देते हैं और फिट नहीं होते हैं तो उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा."
देश में ऐसे पुलिसकर्मी आसानी से कहीं भी दिख जाएंगे. पिछले दो दशकों
में विभाग के कराए गए कुछ सर्वे में भी यह बात समाने आई है कि वे स्वस्थ
नहीं है. पुलिसकर्मी, ख़ासकर ट्रैफ़िक व्यवस्था में लगे कर्मी को फेफड़े और
दिल की बीमारी होती है.
लेकिन भास्कर राव ने जवानों को फ़िट रहने के लिए यूं ही नहीं कहा है. वो इसके पीछे बड़ी वजह बताते हैं.
वो
कहते हैं, "पिछले 18 महीनों में, हमारे 153 कर्मियों की मौत हो गई. उनमें
से 24 की मौत सड़क दुर्घटना में और नौ ने आत्महत्या कर ली. बाकी की मौतें
मधुमेह, दिल की बीमारी और अन्य स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों की वजह से
हुईं. यह सावधान करने वाली स्थिति है."
राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक तनाव और दूसरी ज़रूरतों में
क़ानून व्यवस्था को संभाल रहे रिजर्व पुलिस के जवानों को अधिकतर खाने में
चावल के पकवान दिए जाते हैं.
भास्कर राव कहते हैं, "वे लोग चावल के
पकवान खाते हैं, फिर सिगरेट पीते हैं और बाद में शराब भी. खेल-कूद जैसे शारीरिक परिश्रम की कमी के चलते वे मोटे हो रहे हैं और उनकी वर्दी छोटी हो
रही है. इसलिए प्लाटून कमांडर को उन्हें फ़िट बनाने को कहा गया है."
एक प्लाटून कमांडर के अंदर रिजर्व पुलिस के 25 जवान होते हैं. उन्हें हर हफ्ते जवानों का वजन करने को कहा गया है.
जवानों को फिट रखने के लिए केएआरपी ने स्वीमिंग और योग क्लास की शुरुआत
की है. उन्हें विभिन्न खेल-कूद में भाग लेने को भी कहा जा रहा है.
ये सबकुछ उन्हें डॉक्टरों की सलाह पर करने को कहा गया है.
भास्कर
राव कहते हैं, "हमारी यही योजना है. अगर वे स्वास्थ्य रहेंगे, उनका जीवन
अच्छा होगा. वो लंबा जिएंगे. हम चाहते हैं कि वो जब अपने परिवार लौटे तो
स्वस्थ रहें. हमारी योजना है कि वो 60 साल की उम्र में तीन जवान लोगों को
अकेले संभाल सके."
अगली बार जब आप किसी रेस्टोरेंट में
जाएं और वहां मछली या कोई और सी-फ़ूड ऑर्डर करें तो इस तस्वीर को ज़हन में
रखें. इस तस्वीर को अगर ज़ूम करके देखेंगे तो बहुत से नीले बिंदु नज़र
आएंगे. ये नीले बिंदु दुनिया भर में हज़ारों जहाज़ों से की जाने वाली
कमर्शियल फ़िशिंग को दर्शाते हैं.
हमारी धरती के दो तिहाई हिस्से पर
समंदर फैले हुए हैं और दुनिया के क़रीब 55 फ़ीसद समुद्री इलाक़े में
कारोबार के लिए मछली पकड़ने का काम हो रहा है. ये दुनिया भर में खेती की
जाने वाली ज़मीन का चार गुना है.
वैसे तो मछली पकड़ने के लिए अक्सर
लोग फ़िशिंग क़ानून का पालन करते हैं. लेकिन कुछ उसका उल्लंघन भी करते हैं.
इस से व्यापार और समुद्र दोनों को नुक़सान पहुंचता है.
ऐसे लोग
ज़रूरत से ज़्यादा मछली समुद्र से निकाल लेते हैं इससे समुद्र में मछलियों
का संतुलन बिगड़ता है, और मछली पालन को भी नुकसान पहुंचता है.
बहुत से देश मछली पकड़ने के क़ायदे क़ानून मज़बूती से लागू नहीं करा
पाते. इसी वजह से ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से मछली पकड़ने का कारोबार लाखों
डॉलर तक पहुंच चुका है.
क़ानूनी और ग़ैर-क़ानूनी दोनों तरीक़ों से हर साल लगभग 23 अरब डॉलर की
मछलियां समंदर से पकड़ी जाती है. विश्व खाद्य संगठन के आकलन के मुताबिक़
समुद्र में मछलियों की तादाद कम होने से विश्व भर में लाखों लोगों की नौकरी
और खाने का संकट पैदा हो सकता है.
मसला ये है कि ग़ैर कानूनी तरीक़े
से मछली पकड़ने का काम छिप कर होता है. समुद्र में लाखों जहाज़ मछली
पकड़ते हैं. ऐसे में वैध तरीक़े से कौन मछली पकड़ रहा है और कौन
ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से, इसका पता लगाना बहुत मुश्किल हो जाता है.
इस
पर रोक लगाने के लिए ही 2016 में स्काई ट्रूथ और गूगल की मदद से ग्लोबल
फ़िशिंग वॉच तैयार की गई है जो सैटेलाइट डेटा की मदद से पर्यावरण संरक्षण
का काम करती है. ये एक मैपिंग प्लेटफॉर्म है. इस मैप के ज़रिए दुनिया भर
में चल रही कमर्शियल फ़िशिंग का पता लगया जा सकता है.
समुद्र के संरक्षण के लिए काम कर रही संस्था ओशियाना समुद्र में चल रही
ग़ैर क़ानूनी गतिविधयों पर नज़र रखने के लिए इस डेटा का इस्तेमाल कर रही
है.
बहुत से बड़े-बड़े जहाज़ों में ऑटोमेटिक आईडेंटिफ़िकेशन सिस्टम
यानी AIS लगा होता है. सैटेलाइट के ज़रिए इन जहाज़ों की स्थिति पता चलती
रहती है और छोटे जहाज़ इनसे टकराने से बच जाते हैं.
इस डेटा के
इस्तेमाल से क़रीब 70 हज़ार जहाज़ों को देखा जा सकता है. AIS की वजह से
ग्लोबल फ़िशिंग वॉच आंकडों के ज़रिए ये पता लगा लेती है कि कौन सा जहाज़ किस समय मछली पकड़ रहा है.
नक़्शे में नज़र आ रहे लाल रंग वाले
इलाक़े को नो-टेक कहा जाता है. ये समुद्र का संरक्षित क्षेत्र है, जहां
कमर्शियल फ़िशिंग की इजाज़त नहीं है. नक़्शे में नज़र आ रहे लाल रंग वाले
बड़े वर्ग वर्ल्ड हेरिटेज साइट संरक्षित फ़ीनिक्स द्वीप को दर्शाते हैं. ये
द्वीप किर्बाती राष्ट्र का है. इस इलाक़े में किरीबाती के समुद्री क़ानून
चलते हैं. एक जनवरी 2015 से यहां मछली पकड़ना ग़ैर क़ानूनी है.
लेकिन,
पाबंदी के छह महीने बाद ही ग्लोबल फ़िशिंग वॉच से पता चला कि संरक्षित
इलाक़े में ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से मछली पकड़ी जा रही है. इस तकनीक की मदद
से ही किरीबाती जैसे छोटे से देश ने ग़ैरक़ानूनी फ़िशिंग करने वाली कंपनी
पर बीस लाख डॉलर का जुर्माना लगाया. किरीबाती जैसे छोटे देश के लिए ये रक़म
बहुत बड़ी थी. ये रक़म इस देश की कुल जीडीपी का एक फ़ीसद थी.
ग्लोबल
फ़िशिंग वॉच जहाज़ों पर लगी AIS की बत्ती के ज़रिए उन्हें पहचानती है.
सवाल उठता है कि अगर जुर्माना इतना भारी है, तो, ये जहाज़ AIS की बत्तियां
बुझा क्यों नहीं देते. अगर जहाज़ बत्तियां बुझा देंगे तो वो अपने लिए ही
ख़तरा मोल ले लेंगे. ऐसा करने से रात में दूसरे जहाज़ों से टकराने की
संभावना काफ़ी बढ़ जाएगी.
अगर कोई जहाज़ ऐसा करता है, तो ज़ाहिर हो
जाएगा कि वो किसी अवैध काम में लगा हुआ है. मसलन, हो सकता है वो किसी ऐसे
देश की सरहद में दाखिल हो रहा है, जहां उसे जाने की इजाज़त नहीं है. या हो
सकता है कि वो प्रतिबंधित इलाक़े में मछली पकड़ रहे हों. ग्लोबल फ़िशिंग
वॉच ने ऐसी हरकतें भी अपने कैमरे में क़ैद की हैं. लोबल फ़िशिंग वॉच के ज़रिए ट्रांसशिपिंग पर भी नज़र रखी जाती है.
ट्रांसशिपिंग के समय जहाज़ पकड़ी गई मछलियां कार्गो वाले जहाज़ पर शिफ़्ट
करते हैं. वो यहीं तेल भी भरवाते हैं. ट्रांसशिपिंग के तहत जहाज़ समुद्र
में कई महीने तक खड़े रह सकते हैं. ये पूरी तरह से क़ानूनी है.
लेकिन,
कई जगह इसकी भी इजाज़त नहीं है. दरअसल इस दौरान दीगर ग़ैर कानूनी
गतिविधियां होने लगती है. जैसे मानव तस्करी का ख़तरा बढ़ जाता है. या हो
सकता है अगर कोई कर्मचारी जाना चाहता है, उसे यहां बंदी बना कर रखा जा सकता
है.
अमरीकी विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़िशिंग
इंडस्ट्री में कम उम्र बच्चों को तस्करी के ज़रिए लाकर काम पर लगाया जाता
है. क़रीब 40 फ़ीसद कर्मचारी 18 से कम उम्र के होते हैं. यहां मारपीट भी
ख़ूब होती है.
समुद्र से मछली पकड़ने के काम में पारदर्शिता लाने के लिए सरकारें अहम
रोल निभा सकती हैं. इसके लिए उन्हें वेज़ल मॉनिटरिंग सिस्टम डेटा को सार्वजनिक करना होगा.
इंडोनेशिया इस दिशा में पहल कर चुका है.
समुद्र में मछलियों का संतुलन बनाए रखने और ग़ैर कानूनी फ़िशिंग पर लगाम
कसने के लिए अन्य देशों से भी ऐसे ही सहयोग की उम्मीद है.
सनी लियोनी की ज़िंदगी पर बनी 'वेब-सीरीज़', करनजीत कौर, के ट्रेलर में एक पत्रकार उनसे पूछता है, "किसी
प्रॉस्टीट्यूट और पॉर्न स्टार के बीच क्या फ़र्क होता है?"
जवाब में सनी लियोनी कहती हैं, "एक सिमिलैरिटी है - गट्स".
यही 'गट्स' यानी हिम्मत सनी लियोनी की चाल, चेहरे और बातों में दिखी जब वो मुंबई के एक होटल में इंटरव्यू के लिए मुझसे मिलीं.
उन्होंने बताया कि करनजीत कौर के लिए पत्रकार के साथ वो इंटरव्यू का सीन शूट करना बेहद मुश्किल था.
सनी ने कहा, "मुझे बहुत असहज लगा क्योंकि वो बहुत बुरे सवाल थे पर हमने
उन्हें रखा क्योंकि ये सवाल लोगों के मन में होते हैं और मैं उनका जवाब
देना चाहती थी."
सनी लियोनी पिछले पांच सालों से भारत में सबसे ज़्यादा 'गूगल' किया गया
नाम है. लोग उन्हें देखना चाहते हैं, उनके बारे में जानना चाहते हैं लेकिन
काफ़ी हद तक उनके बारे में अपनी राय पहले ही बना चुके हैं.
सनी मानती हैं कि उनके बारे में एक तरह की राय बनने की वजह वो ख़ुद हैं.
"मैं
अपनी सोच और अपनी ज़िंदगी को लेकर एकदम पारदर्शी हूँ, लेकिन लोग मुझे मेरे पिछले पेशे से जोड़कर ही देखते हैं, उसमें उनकी कोई ग़लती भी नहीं, पर समय
के साथ मैं भी बदली हूँ और उम्मीद है लोग भी मेरे व्यक्तित्व में इस बदलाव
को समझेंगे."
वो बॉलीवुड में 'आइटम नंबर' कहे जानेवाले गानों के बाद
अब फ़िल्मों में पूरे किरदार निभा चुकी हैं. हाल में उनकी ख़ुद की
परफ़्यूम, 'द लस्ट' भी लॉन्च हुई है.
मैंने पूछा कि ये नाम भी तो उनकी ख़ास छवि को ही आगे ले जाता है?
उन्होंने इनकार कर दिया और कहा कि इतनी कम उम्र में अपने नाम की
परफ़्यूम होना किसी भी लड़की के लिए ख़्वाब जैसा है और जब वो सच हुआ तो
उन्हें यही नाम पसंद आया.
सनी का कहना था, "बाक़ि परफ़्यूम ब्रैंड भी तो ऐसे नाम रखते हैं, जैसे सिडक्शन या फ़ायर एंड आइस." करनजीत कौर', सनी लिओनी का असली नाम है.
उनकी ज़िंदगी पर बनी वेब
सीरीज़ को ये नाम दिए जाने का शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने विरोध
किया था और कहा था कि 'कौर' नाम सिख धर्म में बहुत महत्व रखता है जबकि सनी
का काम पॉर्न से जुड़ा था.
सनी के सामने मैंने जब ये बात रखी तो
उन्होंने कहा कि ये नाम उनके पासपोर्ट पर है. उनके मां-बाप ने उन्हें दिया
था जो अब इसपर सफ़ाई देने के लिए दुनिया में नहीं है
वो बोलीं, "वैसे भी मेरा सच्चा नाम करनजीत कौर है, और सिर्फ़ मेरे काम का नाम सनी लियोनी है."
पॉर्न इंडस्ट्री में अपने काम को लेकर सनी लियोनी कभी शर्मिंदा नहीं हुई हैं. उस दिन भी उन्होंने कहा कि ये उनकी पसंद थी.
भारत में निजी तौर पर पॉर्न देखने पर कोई रोक नहीं है पर पॉर्न वीडियो, तस्वीरें इत्यादि बनाना या बांटना ग़ैर-क़ानूनी है.
दुनिया की सबसे बड़ी पॉर्न वेबसाइट 'पॉर्नहब' के मुताबिक अमरीका, ब्रिटेन और कनाडा के बाद भारत में सबसे ज़्यादा पॉर्न देखा जाता है.
तो क्या भारत में भी क़ानूनी तौर पर पॉर्न इंडस्ट्री होनी चाहिए?
इस सवाल का जवाब देने से सनी एक पल के लिए भी झिझकी नहीं, कहा, "ये मेरा फ़ैसला नहीं, भारत सरकार और यहां के लोगों का होगा".
पर क्या ऐसा उद्योग होने से यौन संबंधों के बारे में सहजता और ख़ुलापन होगा? अमरीका में उनका अनुभव क्या कहता है?
जवाब
में सनी ने कहा कि उनकी निजी पसंद किसी और पर थोपी नहीं जानी चाहिए. समाज
की सोच हर परिवार से बनती है और हर लड़की की उनकी मां-बाप की परवरिश से.
सनी
के मां-बाप को उनका ये फ़ैसला बिल्कुल नागवार था. पर वो मानती हैं कि
उन्हें एक बेहद आज़ाद ख़्याल लड़की की तरह बड़ा किया गया जिस वजह से वो
अपने मां-बाप की इज़्ज़त भी करती हैं और अपनी पसंद के फ़ैसले भी ले पाई
हैं.
अब सनी के अपने बच्चे हैं. उन्होंने एक बेटी को गोद लिया है और सरोगेसी से दो बेटे हैं.
क्या उन्हें वो ज़िंदगी के फ़ैसले लेने की आज़ादी दे पाएंगी?
सनी ने कहा, "बेशक़, मैं चाहूंगी वो ऊंचाइयां छुएं, मार्स तक जाएं लेकिन उनके फ़ैसले और रास्ते उनके अपने होंगे."
मेरा आख़िरी सवाल शायद सबसे मुश्किल था. वो सनी लियोनी के बारे में तो था पर शायद उसका जवाब करनजीत कौर को देना था.
क्या आप अपने पिछले पेशे के बारे में अपने बच्चों को समझा पाएंगी?
सनी को ये अच्छा तो नहीं लगा. पर ये सवाल उनके मन में कौंधा ना हो, ऐसा भी नहीं.
अपनी ज़िंदगी में उन्होंने जो भी फ़ैसले लिए उनकी वजह से आम लोगों में बनी समझ और धारणाओं के साथ जीना आसान नहीं है.
पर
वही 'गट्स' के साथ उन्होंने कहा कि इस व़क्त ये उनका सरोकार नहीं. उनके मन
में लंबे समय से मां बनने की तमन्ना थी और अब वो उस अनुभव के हर पल का रस
ले रही हैं.
पर बोलीं जब व़क्त आएगा तो वो इतना ज़रूर करेंगी कि अपना पक्ष सच्चाई से बच्चों के सामने रखें.
मशहूर लेखिका कृष्णा सोबती ने कहा था कि 'भारत-पाकिस्तान के बंटवारे को भूलना मुश्किल है और याद रखना ख़तरनाक.'
उन्हीं के दौर की लेखिका अमृता प्रीतम ने बँटवारे को लेकर अपना दर्द एक नज़्म के ज़रिए बयां किया था.
इस
नज़्म में उन्होंने पंजाब के महान कवि वारिस शाह को आवाज़ देकर अपनी
तकलीफ़ बयां की थी. वारिस शाह ने ही हीर-रांझा की प्रेम कहानी लिखी थी.
अमृता प्रीतम ने पंजाबी में जो नज़्म लिखी थी, उसका तर्जुमा कुछ इस तरह है-
"आज पूछती हूं तुझसे ऐ वारिस शाह!
दोनों ही लेखिकाओं ने अपने-अपने तरीक़े से बँटवारे के पेचीदा मसलों पर
अपनी राय बयां की थी. उस दौर की बेहद तकलीफ़देह घटनाओं को याद करने की
मुश्किल और उनके बारे में बात करने की चुनौती को सोबती और प्रीतम ने बख़ूबी
बताया था.
भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के 70 साल से ज़्यादा समय
बीत चुके हैं. लेकिन दोनों देश आज तक उस तकलीफ़ से उबर नहीं सके हैं. उस
दौरान इंसानियत को जो ज़ख़्म मिले, वो अब तक पूरी तरह नहीं भरे हैं.
बरसों
से तारीख़ का ये पन्ना हज़ारों-लाखों घरों में ज़िंदा रहा है. तकलीफ़ का
वो दौर तमाम इंसानों के दिल में ठिकाना बनाए बैठा हुआ है. बंटवारे का दर्द
झेलने वालों ने हज़ार बार ये क़िस्से और आपबीती अपने घरवालों, रिश्तेदारों,
दोस्तों, जानने वालों को सुनाया होगा.
उस दर्द को बार-बार बताकर
बँटवारे के शिकार लोगों ने अपना दर्द कम करने की कोशिश की. उन्होंने अपने
तज़ुर्बे बांटकर बताया कि उस वक़्त कैसे उन्हें अपना वतन और अपना घर-बार
बँटवारे की वजह से गंवाना पड़ा था.गर घरों की चारदीवारी के बाहर इन दर्द भरे क़िस्सों का कोई पुरसां हाल
नहीं था. ज़्यादातर लोग तो उन बातों को सुनना भी नहीं चाहते थे. जिन लोगों
ने ये क़िस्से सुने भी, उन्हें भी ये इतने अहम नहीं लगे कि इन्हें बंटवारे
के इतिहास में शामिल करते.
फिर भी, भारत और पाकिस्तान का बँटवारा इतना हिंसक था, इसमें इतना ख़ून बहा था कि आज ये ज़रूरी है कि हम इसे याद रखें.
मैं
कई बार ख़ुद के परिवार के अतीत के बारे में सोचती हूं. मैं शरणार्थियों के
परिवार से ताल्लुक़ रखती हूं. मेरे मां-पिता दोनों को ही बँटवारे की वजह
से अपना घर-बार, शहर छोड़ना पड़ा था.
हालांकि क़िस्मत अच्छी थी कि
दोनों ही हिंसा का शिकार होने से बच गए थे. फिर भी बँटवारे का ज़ख़्म उनके
दिलों में बहुत गहरे बैठा था. इसके बहुत से अनछुए पहलू थे, जो हमारी
ज़िंदगी पर साए की तरह मंडराते रहे हैं.
मेरी मां के भाई उस वक़्त 20 बरस के थे. उन्होंने पाकिस्तान में ही रहने
का फ़ैसला किया था. बाद में उन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया. उन्होंने
मेरी नानी का भी धर्म परिवर्तन करा दिया था. वो भी मुसलमान हो गई थीं.
मेरी मां और उनके दूसरे भाई-बहन फिर कभी अपनी मां से नहीं मिले. मैं अपनी पूरी उम्र अपने मामा और नानी की कहानी सुनती आई हूं.
हालांकि
मैंने उन बातों को ये सोचकर ज़्यादा तवज्जो नहीं दी कि ये तो बुज़ुर्गों
के क़िस्से हैं. लेकिन, 1984 में जब दिल्ली में मैंने सिखों के ख़िलाफ़
भयंकर हिंसा देखी, तब जाकर मुझे बँटवारे के क़िस्सों की अहमियत का एहसास
हुआ. तब मैंने वो क़िस्से गंभीरता से सुनने शुरू किए. आख़िर इन कहानियों को अब तक तवज्जो क्यों नहीं दी गई? क्या वो बंटवारे,
आज़ादी की तारीख़ का हिस्सा नहीं हैं? क्या हम उनकी इसलिए अनदेखी करते हैं
कि उस इतिहास के तमाम क़िरदार आज भी ज़िंदा हैं?
इन सवालों के जवाब तलाशना इतना आसान नहीं, मगर इतना मुश्किल भी नहीं. भारत के लिए बँटवारा आज़ादी की क़ीमत था.
जब भी हम आज़ादी का जश्न मनाने बैठते हैं, बँटवारे का दर्द उभर आता है. स्वतंत्र भारत के इतिहास का काला पन्ना है बँटवारा.
इसकी
वजह से भारत के टुकड़े हो गए. हिंदुस्तान ने अपना एक हिस्सा गंवा दिया.
इसीलिए इस घटना का राजनैतिक इतिहास तो याद रखा जाता है, मगर बँटवारे के
मानवीय तज़ुर्बे, इंसानी तकलीफ़ के वो क़िस्से हमेशा ही दफ़्न करने की
कोशिश होती रही है.
पाकिस्तान के लिए बँटवारे से ज़्यादा अहमियत एक नए मुल्क का बनना था.
मुसलमानों का अपना वतन. इसीलिए उस दौर के ख़ून-ख़राबे को याद रखने की
ज़रूरत पाकिस्तान के लोगों को महसूस नहीं होती.
उस दौर के लोगों के
लिए और भी चुनौतियां थीं. बँटवारे के दौरान भड़की हिंसा की यादें भले ही
ज़हन से नहीं गईं. लेकिन उस दौरान पहली चुनौती ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर
लाने की थी. अपना घर-बार लुटाकर आए लोगों के लिए उस तकलीफ़ को याद करने से
ज़्यादा अहम आगे की ज़िंदगी की फ़िक्र करना था. उनके पास तकलीफ़ों को याद
करने के लिए वक़्त ही नहीं था.
लोगों को कुछ बातें और घटनाएं याद
रखने के लिए कुछ ऐसे लोगों की ज़रूरत होती है, जिनसे वो दर्द या ख़ुशी बांट
सकें. वो क़िस्से साझा कर सकें. लेकिन बरसों से हम जैसे लोग-जिन्होंने
बँटवारे का दर्द नहीं झेला था-वो ये क़िस्से सुनने को राज़ी नहीं थे. हम
अपने मां-बाप या दादी-दादा से वो क़िस्से सुनने में दिलचस्पी ही नहीं लेते
थे.
साल 1947 में भारत के बँटवारे के बाद से ही पश्चिम बंगाल सांप्रदायिक राजनीति का आसान निशाना रहा है.
उदारवादी,
धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताक़तें भले ही बंगाल को सांप्रदायिक सद्भाव
की मिसाल बनाकर पेश क्यों न करती रही हों पर विभाजन के बाद कई बार होने
वाले दंगों ने बंगाल के आधुनिक इतिहास पर अपने निशान छोड़े हैं और
उदारवादियों के दावों पर सवाल भी उठाए हैं.
1950, 1963 और 1992 में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों में तो
इसके अलावा भी पिछले 70 सालों में पश्चिम बंगाल में स्थानीय स्तर पर हिंसा की अनगिनत घटनाएं हुई हैं.
हाल
के वर्षों में उत्तर 24-परगना के बासिरहाट, हावड़ा के धूलागढ़ और मालदा के
कालियाचाक में हुए दंगे, साप्रदायिक हिंसा की इसी परंपरा का विस्तार है.
बहुत बड़े और व्यापक स्तर पर हिंसा हुई थी.
हालांकि ख़ुद के सेक्युलर होने का दावा करने वाली पार्टियों ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस खाई को पकड़ा और हिंदू बहुल आबादी को अपने पक्ष में करने की कोशिश शुरू कर दी.
ये
महज संयोग की बात नहीं है कि उस वक़्त बंगाल में बीजेपी के श्यामा प्रसाद
मुखर्जी ने बढ़-चढ़कर काम किया और दक्षिणपंथी भारतीय जनसंघ पार्टी बनाई.
यही आगे चलकर बीजेपी यानी भारतीय जनता पार्टी कहलाई.
हालांकि नया क़ानून लाकर ग़रीब किसानों को ज़मीन देने की वजह से वामदलों ने उनका समर्थन हासिल कर लिया.
दंगों
में हिस्सा लेने वाले आम तौर पर समाज के सबसे ग़रीब तबकों से ताल्लुक रखते
हैं. इनमें भी ज़्यादातर पेशे से ग़रीब किसान और कामगार होते हैं.
देश की आज़ादी के तुरंत बाद सरकार ने ज़मींदारी प्रथा को ख़त्म कर दिया और इससे ग़रीबों के सपनों को पंख लग गए.
1950-1980
के दशक में राजनीतिक एजेंडा इन्हीं मुद्दों पर आधारित था. तब कांग्रेस और
वामदलों के आंदोलनों के केंद्र में भी ग़रीब तबका ही था, फिर चाहे वो हिंदू
हो या मुसलमान.
बाद में आर्थिक उदारीकरण और सुधारों के दौर में जब कॉर्पोरेट घरानों को
देने के लिए किसानों की ज़मीन का अधिग्रहण किया जाने लगा तो वाम पार्टियां
अपने एजेंडे से भटक गईं.
इस समय उन्होंने कॉर्पोरेट घरानों और
उद्यमियों को सस्ते दामों में ज़मीन और बाकी सुविधाएं देकर निवेश के लिए
आकर्षित करने की कोशिश की.
इसका नतीजा यह हुआ कि वामदलों की रीढ़ माने जाने वाले किसान और ग़रीब कामगर उससे दूर हो गए.
उन्होंने सिंगूर और नंदीग्राम में कॉर्पोरेट घरानों के ख़िलाफ़
ज़बर्दस्त आंदोलन किया और आख़िरकार सत्ता वामदलों के हाथों से निकल गई.
चुनावी आंकड़ों की नज़र से देखें तो राज्य में तक़रीबन 28% मुस्लिम आबादी है, जो काफ़ी अहम है.
पहले वाम पार्टियां ग्रामीण बंगाल में अपनी धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से मुसलमान वोटरों को आकर्षित कर लेती थीं.
लेकिन बाद में सिंगूर और नंदीग्राम विरोधी आंदोलनों के बाद वामदलों के हाथों से उनके वोट निकल गए.
ममता बनर्जी ने मुसलमानों को लुभाया
सत्ता
में आने के बाद ममता बनर्जी ने इस वर्ग को लुभाना शुरू कर दिया. उन्होंने
हाई कोर्ट के निर्देशों को नज़रअंदाज़ करते हुए 1,22,000 इमामों और कुछ
हज़ार मुअज़्ज़िनों को मासिक भत्ता देना शुरू कर दिया.
कोलकाता हाई
कोर्ट ने कहा था कि हिंदू पुजारियों की मांग ख़ारिज़ करते हुए सिर्फ़
इमामों को भत्ता देना धर्म के आधार पर भेदभाव करने जैसा है.
इसके अलावा बंगाल में बांग्लादेश से आने वाले अवैध प्रवासियों का मामला भी है.
साल
1989 में सरकार ने संसद में एक रिपोर्ट पेश करते हुए कहा था कि राज्य के
बांग्लादेश से सटे 11 ज़िलों में आबादी बढ़ने की दर देश की आबादी बढ़ने की
दर से बहुत ज़्यादा है.
उसके बाद से पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और मेघालय की राजनीति में अवैध प्रवासियों का मामला उभरकर सामने आने लगा.
अवैध प्रवासियों को लेकर बीजेपी शुरू से ही सांप्रदायिक रुख अपनाती आई है.
बीजेपी
के मुताबिक़ बांग्लादेश से आने वाले हिंदू 'शरणार्थियों' का भारत में
स्वागत है, लेकिन वहीं से आने वाले मुसलमान 'अवैध प्रवासी' हैं और उन्हें
भारत में रहने का कोई हक़ नहीं है.
साल 2014 के आम चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने बंगाल में बीजेपी के
चुनावी अभियान का नेतृत्व किया था और उन्होंने अपने भाषणों में
'बांग्लादेशियों' को वापस भेजने की बात कही थी.
इन सब वजहों से
मुस्लिम वोट ममता बनर्जी के पक्ष में चले गए और हिंदू वोट बीजेपी के पक्ष
में. बीजेपी को पश्चिम बंगाल में लोकसभा दो सीटें मिलीं और 2016 के
विधानसभा चुनाव में तीन सीटें.
वैसे तो हालिया पंचायत चुनाव में
बीजेपी को ग्राम पंचायत के स्तर पर अच्छी खासी सीटें मिलीं लेकिन पंचायत
समिति और जिला परिषद् में उसकी उपस्थिति न के बराबर ही है.
दूसरी तरफ़ एक सच यह भी है कि राज्य में सीपीआईएम और कांग्रेस जैसी सेक्युलर पार्टियां लगातार कमज़ोर हो रही हैं.
यही वजह है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के बड़े नेता बंगाल में तमाम राजनीतिक अभियानों में शामिल होते नज़र आ रहे हैं.
आरएसएस भी पश्चिम बंगाल में ज़मीनी काम में जुटी हुई है. राज्य में संघ की शाखाओं में लगातार बढ़त दर्ज की जा रही है.
साल
2013 में यहां संघ की 750 शाखाएं थीं जो 2018 में बढ़कर 1279 हो गईं. साल
2017 में रामनवमी के मौके पर बीजेपी और आरएसएस ने मिलकर राज्य के कई जिलों
में भारी भीड़ जुटाई थी.