Friday, August 31, 2018

भारत में पॉर्न इंडस्ट्री के बारे में क्या सोचती हैं सनी लियोनी

सनी लियोनी की ज़िंदगी पर बनी 'वेब-सीरीज़', करनजीत कौर, के ट्रेलर में एक पत्रकार उनसे पूछता है, "किसी प्रॉस्टीट्यूट और पॉर्न स्टार के बीच क्या फ़र्क होता है?"
जवाब में सनी लियोनी कहती हैं, "एक सिमिलैरिटी है - गट्स".
यही 'गट्स' यानी हिम्मत सनी लियोनी की चाल, चेहरे और बातों में दिखी जब वो मुंबई के एक होटल में इंटरव्यू के लिए मुझसे मिलीं.
उन्होंने बताया कि करनजीत कौर के लिए पत्रकार के साथ वो इंटरव्यू का सीन शूट करना बेहद मुश्किल था.
सनी ने कहा, "मुझे बहुत असहज लगा क्योंकि वो बहुत बुरे सवाल थे पर हमने उन्हें रखा क्योंकि ये सवाल लोगों के मन में होते हैं और मैं उनका जवाब देना चाहती थी."
सनी लियोनी पिछले पांच सालों से भारत में सबसे ज़्यादा 'गूगल' किया गया नाम है. लोग उन्हें देखना चाहते हैं, उनके बारे में जानना चाहते हैं लेकिन काफ़ी हद तक उनके बारे में अपनी राय पहले ही बना चुके हैं.
सनी मानती हैं कि उनके बारे में एक तरह की राय बनने की वजह वो ख़ुद हैं.
"मैं अपनी सोच और अपनी ज़िंदगी को लेकर एकदम पारदर्शी हूँ, लेकिन लोग मुझे मेरे पिछले पेशे से जोड़कर ही देखते हैं, उसमें उनकी कोई ग़लती भी नहीं, पर समय के साथ मैं भी बदली हूँ और उम्मीद है लोग भी मेरे व्यक्तित्व में इस बदलाव को समझेंगे."
वो बॉलीवुड में 'आइटम नंबर' कहे जानेवाले गानों के बाद अब फ़िल्मों में पूरे किरदार निभा चुकी हैं. हाल में उनकी ख़ुद की परफ़्यूम, 'द लस्ट' भी लॉन्च हुई है.
मैंने पूछा कि ये नाम भी तो उनकी ख़ास छवि को ही आगे ले जाता है?
उन्होंने इनकार कर दिया और कहा कि इतनी कम उम्र में अपने नाम की परफ़्यूम होना किसी भी लड़की के लिए ख़्वाब जैसा है और जब वो सच हुआ तो उन्हें यही नाम पसंद आया.
सनी का कहना था, "बाक़ि परफ़्यूम ब्रैंड भी तो ऐसे नाम रखते हैं, जैसे सिडक्शन या फ़ायर एंड आइस." करनजीत कौर', सनी लिओनी का असली नाम है.
उनकी ज़िंदगी पर बनी वेब सीरीज़ को ये नाम दिए जाने का शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने विरोध किया था और कहा था कि 'कौर' नाम सिख धर्म में बहुत महत्व रखता है जबकि सनी का काम पॉर्न से जुड़ा था.
सनी के सामने मैंने जब ये बात रखी तो उन्होंने कहा कि ये नाम उनके पासपोर्ट पर है. उनके मां-बाप ने उन्हें दिया था जो अब इसपर सफ़ाई देने के लिए दुनिया में नहीं है
वो बोलीं, "वैसे भी मेरा सच्चा नाम करनजीत कौर है, और सिर्फ़ मेरे काम का नाम सनी लियोनी है."
पॉर्न इंडस्ट्री में अपने काम को लेकर सनी लियोनी कभी शर्मिंदा नहीं हुई हैं. उस दिन भी उन्होंने कहा कि ये उनकी पसंद थी.
भारत में निजी तौर पर पॉर्न देखने पर कोई रोक नहीं है पर पॉर्न वीडियो, तस्वीरें इत्यादि बनाना या बांटना ग़ैर-क़ानूनी है.
दुनिया की सबसे बड़ी पॉर्न वेबसाइट 'पॉर्नहब' के मुताबिक अमरीका, ब्रिटेन और कनाडा के बाद भारत में सबसे ज़्यादा पॉर्न देखा जाता है.
तो क्या भारत में भी क़ानूनी तौर पर पॉर्न इंडस्ट्री होनी चाहिए?
इस सवाल का जवाब देने से सनी एक पल के लिए भी झिझकी नहीं, कहा, "ये मेरा फ़ैसला नहीं, भारत सरकार और यहां के लोगों का होगा".
पर क्या ऐसा उद्योग होने से यौन संबंधों के बारे में सहजता और ख़ुलापन होगा? अमरीका में उनका अनुभव क्या कहता है?
जवाब में सनी ने कहा कि उनकी निजी पसंद किसी और पर थोपी नहीं जानी चाहिए. समाज की सोच हर परिवार से बनती है और हर लड़की की उनकी मां-बाप की परवरिश से.
सनी के मां-बाप को उनका ये फ़ैसला बिल्कुल नागवार था. पर वो मानती हैं कि उन्हें एक बेहद आज़ाद ख़्याल लड़की की तरह बड़ा किया गया जिस वजह से वो अपने मां-बाप की इज़्ज़त भी करती हैं और अपनी पसंद के फ़ैसले भी ले पाई हैं.
अब सनी के अपने बच्चे हैं. उन्होंने एक बेटी को गोद लिया है और सरोगेसी से दो बेटे हैं.
क्या उन्हें वो ज़िंदगी के फ़ैसले लेने की आज़ादी दे पाएंगी?
सनी ने कहा, "बेशक़, मैं चाहूंगी वो ऊंचाइयां छुएं, मार्स तक जाएं लेकिन उनके फ़ैसले और रास्ते उनके अपने होंगे."
मेरा आख़िरी सवाल शायद सबसे मुश्किल था. वो सनी लियोनी के बारे में तो था पर शायद उसका जवाब करनजीत कौर को देना था.
क्या आप अपने पिछले पेशे के बारे में अपने बच्चों को समझा पाएंगी?
सनी को ये अच्छा तो नहीं लगा. पर ये सवाल उनके मन में कौंधा ना हो, ऐसा भी नहीं.
अपनी ज़िंदगी में उन्होंने जो भी फ़ैसले लिए उनकी वजह से आम लोगों में बनी समझ और धारणाओं के साथ जीना आसान नहीं है.
पर वही 'गट्स' के साथ उन्होंने कहा कि इस व़क्त ये उनका सरोकार नहीं. उनके मन में लंबे समय से मां बनने की तमन्ना थी और अब वो उस अनुभव के हर पल का रस ले रही हैं.
पर बोलीं जब व़क्त आएगा तो वो इतना ज़रूर करेंगी कि अपना पक्ष सच्चाई से बच्चों के सामने रखें.

Friday, August 17, 2018

《八百万》系列播客:第三集 中国的塑料垃圾分类

以为你的可回收垃圾都会被送到本地的处理厂吗?那你可就大错特错了,它们很可能会被运往中国,全球约一半的塑料垃圾都会被出口到中国。然而2018年1月,中国决定禁止塑料垃圾进口,这一模式也宣告终结。西方国家现在不得不自己处理垃圾。但是,是什么促使中国要关闭这么多民众赖以为生的行业呢?
龙美诗:欢迎收听“八百万”系列播客节目。每年流入海洋环境的塑料垃圾有800万吨,在应对这一全球挑战的过程中,中国又发挥着怎样的作用呢?本节目将围绕这个问题展开讨论。本节目由可持续发展亚洲组织,及其合作伙伴“中外对话”和艾雅录音室共同出品。
龙美诗:上期节目回顾……
尼克:针对目前被认为是海洋垃圾最大贡献者的一些经济体,我们必须着眼于建立基本的垃圾收集和回收体系。
克里斯汀:我认为中国政府一直在思考未来的中国应该是什么样子,描绘一个中国梦。
龙美诗:大家好,我是龙美诗。我在香港生活有20年了,目睹了越来越多的一次性塑料制品在真真切切地改变着这里的海洋和海滩的生态结构。作为一名帆船运动者和露天游泳运动的爱好者,塑料垃圾真地改变了我对香港生活质量的看法。随着生活在亚洲的朋友越来越多地在海边享乐、休憩,他们也认识到,塑料也是一味追求便利的生活方式带来的不良副产品。
本节目的目标是揭示中国塑料垃圾管理的内在运作方式,从而了解中国对海洋塑料的影响。
上期节目,我们讨论了河流在塑料垃圾进入海洋过程中发挥的关键作用,还谈到了中国政府如何推动各项环境新政的实施。本期节目中,让我们把目光转到陆地上,关注中国的垃圾管理流程,看看塑料垃圾是如何从陆上进入水道的。我采访了中国零废弃运动发起人、北京非政府组织“自然大学”的创始人毛达,他对这个问题的概括如下:
毛达:因为这个塑料垃圾最直接的入海原因就是从江和河流……
旁白:塑料垃圾最直接的入海原因就是从江和河流。在中国,河流穿过无数的农村,农村的垃圾收集不像在城市那样普遍。缺乏健全的塑料垃圾收集和加工体系是中国塑料垃圾入海的原因。美诗:一些国家面临的挑战是找地方堆放垃圾,但中国的问题主要是缺乏垃圾收集分类的系统和基础设施。根据麦肯锡咨询公司和海洋保护协会近来发布的名为《阻止潮流》的报告,中国城市的垃圾收集率平均是65%,农村地区仅为5%,远落后于城市。95%的农村垃圾没有进入处理站。但这并不是说城市里的一切都是美好的,不断增长的城市人口和不断变化的生活方式,都导致了毛达所说的—— 毛达:空前的危机……
龙美诗:一场空前的危机 
龙美诗:世界银行估计,中国每年产生近2亿公吨的垃圾——与美国大致相当,但远超过印度。中国生产垃圾的速度预计比全球平均快50%。
导致垃圾产量如此惊人的因素有很多;当然人口不断增长是其中之一,但新增财富导致生活方式的改变也是原因之一。
毛达:那么这部分的垃圾在中国来讲,我们现在的塑料包装物
旁白:塑料包装在垃圾中占的比例越来越高,我们现在注意到网购、外卖等新型消费模式导致我们对塑料的需求更大了。这就是导致中国的塑料问题难以控制的原因。
龙美诗:但现有的垃圾那么多,还有更多的正在生产出来,中国之前却还要从发达国家进口数百万吨垃圾。一艘艘集装箱货船满载着未经处理的垃圾驶入香港等地的港口,然后把货物卸下来留给中国分类回收。这种情况一直持续到今年1月,也就是几个月前,中国宣布将禁止进口未经处理的垃圾——这实际上是宣布自己将不再扮演世界垃圾收集站的角色了。
我问毛达为什么突然做这样的决定?
毛达:这个政策我觉得是一系列的大的环境政策、环境治理改革的一部分……
旁白:这是一系列的大的环境政策、环境治理改革的一部分。颁布这一禁令有几个原因。首先,中国对垃圾回收过程中的污染和有害影响进行了无数的研究,所以才会拖了这么久才处理。中国目前正处于经济转型升级阶段,回收进口垃圾的价值和它的负面影响相比非常的低,所以我们应该把这个政策视为更大的改革的一部分。
另一个原因是国际形象。中国公众认为进口外国垃圾很丢脸,这道禁令可以提升我们的负面国际形象,我们正在以实际行动告诉其他发展中国家,我们不必再接受西方污染了。
此次进口禁令的范围很广,所有来自非工业源头的塑料垃圾都不得进口。尽管我们的塑料回收行业希望继续接收价值高、生态足迹很小的清洁塑料瓶,但事实上,中国已经禁止进口所有塑料,包括清洁塑料在内。这说明其中还有其他考量因素在起作用。我认为这项禁令是一项为了促进生活垃圾分类的战略性决定。我们制造的垃圾比其他任何国家都多,为什么还要从国外进口垃圾来推动回收行业的发展?原因很简单:中国缺乏垃圾分类系统。
龙美诗:中国正在制造更多的垃圾,但垃圾分类系统并没有与时俱进。
陈立雯:在中国,其实,塑料的回收主要是拾荒体系……
旁白:在中国,分类和回收都是由非正规部门完成的,这就是指小型企业,甚至是家庭作坊。他们从特定地区收集垃圾,然后拆分,把可回收的部分出售给加工中心。然后由这些中心进一步分拣,再送往回收工厂。 
龙美诗:陈立雯是毛达的同事,同在非政府组织“自然大学”供职。她向我们描述了所谓的拾荒。拾荒不仅中国有,整个发展中世界都有。但随着中国跻身发达国家的行列,中央政府对待垃圾的态度正在发生变化。在上期节目中谈论了中国环境计划的克里斯汀·罗有话要说:
克里斯汀:我们在香港看到从事这类工作的人年纪都很大。香港比较特殊的地方就是,这是个非正规部门,如果你仔细研究一下:通常是一些老年人常年四处翻垃圾箱,收集垃圾。这样一个非正规的系统,居然成功地从垃圾流中挑出了35%的可回收垃圾。非常了不起,但你不能光指望这个。
随着教育和公众意识的提升,我们希望民众在我们处理垃圾时得到更好的保护,这就意味着成本会上升。此外,随着数字化的普及:重量和体积变得非常重要,因为每个城市都必须为自己如何处理不同类型的垃圾设定目标。所以你需要知道,长期依靠这个非正规部门是不可能的,因为拾荒者很难对垃圾做数字记录。
龙美诗:改变拾荒业的不仅仅是经济改革。
毛达:过去的,改革开放以来这40年……
旁白:过去的,改革开放以来这40年,回收业就一直依赖这些个体回收商。这是出于市场需求,因为国有回收产业无法处理所有的可再生资源。这是一个自然而然的过程,而且效率极高。但这些拾荒者大多是外来农民工,在城市中拾荒总会遭到歧视,因而感到自己被边缘化。
毛达:对于城市的垃圾来说,遭遇了更深刻的危机……
旁白:如果没有拾荒者,城市就必须依靠大型企业和国有企业来填补这一缺口,但这些企业缺乏回收动力和对回收过程的理解,我不是说它们不会慢慢积累经验来很好地填补这一缺口,但眼下我们正面临着前所未有的危机。
龙美诗:因此中央政府正在通过广泛立法来强力推进改革;习近平在2016年表示,中国应该对垃圾进行分类。瞧!国务院就制定了一项新的法律,要求到2020年46座城市的商业和政府部门必须达到35%的垃圾回收率,这其中包括商业办公楼、酒店、政府建筑和学校……但仍然不包括家庭垃圾。然后还有执法的问题,陈立雯就此提出了一些很好的观点:
龙美诗:垃圾进口禁令让中国可以集中力量处理国内的垃圾,但除此之外,它还给发达国家敲响了警钟,让他们也来效仿:
毛达:既是敲响了警钟,又是提供了一个新的方式……
旁白:从全球的反应来看,尤其是环保机构,这次的进口禁令实际上是敲响了警钟,它既是警钟,又是提供了一个新的方式,即不能再继续输出环境污染了。发达国家不能通过出口来解决他们自己的环境和资源问题。这实际上是有积极影响的,如果每个发展中国家都这样做,就可以通过环保的方式来处理塑料垃圾
所以这个计划既帮助了发展中国家,也帮助了发达国家。让发展中国家拒绝外国垃圾,专心处理国内可循环利用的资源;而发达国家也终于可以面对长期以来忽视的问题:他们本国缺乏回收能力。如果我们能把注意力放在以生态方式重新设计塑料、发展循环经济,所有国家都将受益于中国的决定。
龙美诗:中国的垃圾禁令出台以来,依赖于这一行业的发达国家要么慌乱地寻找新的地方倾倒自己的垃圾,要么开始扩大本国的回收能力。下期节目中,我们将讨论如何提高回收效率,进而提高回收率,接住中国抛过来的球。
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龙美诗:本节目由可持续发展亚洲组织为您呈现。
我是龙美诗歌。《八百万》节目由我和贝山姆联合制作。
感谢我们优秀的音频工程师,来自艾雅录音室的卡斯滕和阿纳巴特·马顿斯,没有他们就没有这个节目。
我们的徽标和社会媒体宣传由金赛·朗负责。
特别鸣谢旁白科恩·李、音频助理丹尼尔·孙、以及我们“中外对话”的伙伴:帮助构思这个项目的伊莎贝拉·希尔顿、编辑夏·洛婷和克里斯托弗·戴维、以及协助采访和翻译的黄露珊。
欢迎将本节目分享给您的朋友和同事!教育和合作是我们实现亚洲可持续发展的最佳途径。

Tuesday, August 14, 2018

‘बँटवारे को भूलना मुश्किल और याद रखना ख़तरनाक’

मशहूर लेखिका कृष्णा सोबती ने कहा था कि 'भारत-पाकिस्तान के बंटवारे को भूलना मुश्किल है और याद रखना ख़तरनाक.'
उन्हीं के दौर की लेखिका अमृता प्रीतम ने बँटवारे को लेकर अपना दर्द एक नज़्म के ज़रिए बयां किया था.
इस नज़्म में उन्होंने पंजाब के महान कवि वारिस शाह को आवाज़ देकर अपनी तकलीफ़ बयां की थी. वारिस शाह ने ही हीर-रांझा की प्रेम कहानी लिखी थी.
अमृता प्रीतम ने पंजाबी में जो नज़्म लिखी थी, उसका तर्जुमा कुछ इस तरह है-
"आज पूछती हूं तुझसे ऐ वारिस शाह!
दोनों ही लेखिकाओं ने अपने-अपने तरीक़े से बँटवारे के पेचीदा मसलों पर अपनी राय बयां की थी. उस दौर की बेहद तकलीफ़देह घटनाओं को याद करने की मुश्किल और उनके बारे में बात करने की चुनौती को सोबती और प्रीतम ने बख़ूबी बताया था.
भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के 70 साल से ज़्यादा समय बीत चुके हैं. लेकिन दोनों देश आज तक उस तकलीफ़ से उबर नहीं सके हैं. उस दौरान इंसानियत को जो ज़ख़्म मिले, वो अब तक पूरी तरह नहीं भरे हैं.
बरसों से तारीख़ का ये पन्ना हज़ारों-लाखों घरों में ज़िंदा रहा है. तकलीफ़ का वो दौर तमाम इंसानों के दिल में ठिकाना बनाए बैठा हुआ है. बंटवारे का दर्द झेलने वालों ने हज़ार बार ये क़िस्से और आपबीती अपने घरवालों, रिश्तेदारों, दोस्तों, जानने वालों को सुनाया होगा.
उस दर्द को बार-बार बताकर बँटवारे के शिकार लोगों ने अपना दर्द कम करने की कोशिश की. उन्होंने अपने तज़ुर्बे बांटकर बताया कि उस वक़्त कैसे उन्हें अपना वतन और अपना घर-बार बँटवारे की वजह से गंवाना पड़ा था.गर घरों की चारदीवारी के बाहर इन दर्द भरे क़िस्सों का कोई पुरसां हाल नहीं था. ज़्यादातर लोग तो उन बातों को सुनना भी नहीं चाहते थे. जिन लोगों ने ये क़िस्से सुने भी, उन्हें भी ये इतने अहम नहीं लगे कि इन्हें बंटवारे के इतिहास में शामिल करते.
फिर भी, भारत और पाकिस्तान का बँटवारा इतना हिंसक था, इसमें इतना ख़ून बहा था कि आज ये ज़रूरी है कि हम इसे याद रखें.
मैं कई बार ख़ुद के परिवार के अतीत के बारे में सोचती हूं. मैं शरणार्थियों के परिवार से ताल्लुक़ रखती हूं. मेरे मां-पिता दोनों को ही बँटवारे की वजह से अपना घर-बार, शहर छोड़ना पड़ा था.
हालांकि क़िस्मत अच्छी थी कि दोनों ही हिंसा का शिकार होने से बच गए थे. फिर भी बँटवारे का ज़ख़्म उनके दिलों में बहुत गहरे बैठा था. इसके बहुत से अनछुए पहलू थे, जो हमारी ज़िंदगी पर साए की तरह मंडराते रहे हैं.
मेरी मां के भाई उस वक़्त 20 बरस के थे. उन्होंने पाकिस्तान में ही रहने का फ़ैसला किया था. बाद में उन्होंने इस्लाम क़ुबूल कर लिया. उन्होंने मेरी नानी का भी धर्म परिवर्तन करा दिया था. वो भी मुसलमान हो गई थीं.
मेरी मां और उनके दूसरे भाई-बहन फिर कभी अपनी मां से नहीं मिले. मैं अपनी पूरी उम्र अपने मामा और नानी की कहानी सुनती आई हूं.
हालांकि मैंने उन बातों को ये सोचकर ज़्यादा तवज्जो नहीं दी कि ये तो बुज़ुर्गों के क़िस्से हैं. लेकिन, 1984 में जब दिल्ली में मैंने सिखों के ख़िलाफ़ भयंकर हिंसा देखी, तब जाकर मुझे बँटवारे के क़िस्सों की अहमियत का एहसास हुआ. तब मैंने वो क़िस्से गंभीरता से सुनने शुरू किए.
आख़िर इन कहानियों को अब तक तवज्जो क्यों नहीं दी गई? क्या वो बंटवारे, आज़ादी की तारीख़ का हिस्सा नहीं हैं? क्या हम उनकी इसलिए अनदेखी करते हैं कि उस इतिहास के तमाम क़िरदार आज भी ज़िंदा हैं?
इन सवालों के जवाब तलाशना इतना आसान नहीं, मगर इतना मुश्किल भी नहीं. भारत के लिए बँटवारा आज़ादी की क़ीमत था.
जब भी हम आज़ादी का जश्न मनाने बैठते हैं, बँटवारे का दर्द उभर आता है. स्वतंत्र भारत के इतिहास का काला पन्ना है बँटवारा.
इसकी वजह से भारत के टुकड़े हो गए. हिंदुस्तान ने अपना एक हिस्सा गंवा दिया. इसीलिए इस घटना का राजनैतिक इतिहास तो याद रखा जाता है, मगर बँटवारे के मानवीय तज़ुर्बे, इंसानी तकलीफ़ के वो क़िस्से हमेशा ही दफ़्न करने की कोशिश होती रही है.
पाकिस्तान के लिए बँटवारे से ज़्यादा अहमियत एक नए मुल्क का बनना था. मुसलमानों का अपना वतन. इसीलिए उस दौर के ख़ून-ख़राबे को याद रखने की ज़रूरत पाकिस्तान के लोगों को महसूस नहीं होती.
उस दौर के लोगों के लिए और भी चुनौतियां थीं. बँटवारे के दौरान भड़की हिंसा की यादें भले ही ज़हन से नहीं गईं. लेकिन उस दौरान पहली चुनौती ज़िंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की थी. अपना घर-बार लुटाकर आए लोगों के लिए उस तकलीफ़ को याद करने से ज़्यादा अहम आगे की ज़िंदगी की फ़िक्र करना था. उनके पास तकलीफ़ों को याद करने के लिए वक़्त ही नहीं था.
लोगों को कुछ बातें और घटनाएं याद रखने के लिए कुछ ऐसे लोगों की ज़रूरत होती है, जिनसे वो दर्द या ख़ुशी बांट सकें. वो क़िस्से साझा कर सकें. लेकिन बरसों से हम जैसे लोग-जिन्होंने बँटवारे का दर्द नहीं झेला था-वो ये क़िस्से सुनने को राज़ी नहीं थे. हम अपने मां-बाप या दादी-दादा से वो क़िस्से सुनने में दिलचस्पी ही नहीं लेते थे.

Sunday, August 12, 2018

नज़रिया: पश्चिम बंगाल में बीजेपी ऐसे पसार रही है पांव

साल 1947 में भारत के बँटवारे के बाद से ही पश्चिम बंगाल सांप्रदायिक राजनीति का आसान निशाना रहा है.
उदारवादी, धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक ताक़तें भले ही बंगाल को सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल बनाकर पेश क्यों न करती रही हों पर विभाजन के बाद कई बार होने वाले दंगों ने बंगाल के आधुनिक इतिहास पर अपने निशान छोड़े हैं और उदारवादियों के दावों पर सवाल भी उठाए हैं.
1950, 1963 और 1992 में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों में तो
इसके अलावा भी पिछले 70 सालों में पश्चिम बंगाल में स्थानीय स्तर पर हिंसा की अनगिनत घटनाएं हुई हैं.
हाल के वर्षों में उत्तर 24-परगना के बासिरहाट, हावड़ा के धूलागढ़ और मालदा के कालियाचाक में हुए दंगे, साप्रदायिक हिंसा की इसी परंपरा का विस्तार है.
बहुत बड़े और व्यापक स्तर पर हिंसा हुई थी.
हालांकि ख़ुद के सेक्युलर होने का दावा करने वाली पार्टियों ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस खाई को पकड़ा और हिंदू बहुल आबादी को अपने पक्ष में करने की कोशिश शुरू कर दी.
ये महज संयोग की बात नहीं है कि उस वक़्त बंगाल में बीजेपी के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बढ़-चढ़कर काम किया और दक्षिणपंथी भारतीय जनसंघ पार्टी बनाई.
यही आगे चलकर बीजेपी यानी भारतीय जनता पार्टी कहलाई.
हालांकि नया क़ानून लाकर ग़रीब किसानों को ज़मीन देने की वजह से वामदलों ने उनका समर्थन हासिल कर लिया.
दंगों में हिस्सा लेने वाले आम तौर पर समाज के सबसे ग़रीब तबकों से ताल्लुक रखते हैं. इनमें भी ज़्यादातर पेशे से ग़रीब किसान और कामगार होते हैं.
देश की आज़ादी के तुरंत बाद सरकार ने ज़मींदारी प्रथा को ख़त्म कर दिया और इससे ग़रीबों के सपनों को पंख लग गए.
1950-1980 के दशक में राजनीतिक एजेंडा इन्हीं मुद्दों पर आधारित था. तब कांग्रेस और वामदलों के आंदोलनों के केंद्र में भी ग़रीब तबका ही था, फिर चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान.
बाद में आर्थिक उदारीकरण और सुधारों के दौर में जब कॉर्पोरेट घरानों को देने के लिए किसानों की ज़मीन का अधिग्रहण किया जाने लगा तो वाम पार्टियां अपने एजेंडे से भटक गईं.
इस समय उन्होंने कॉर्पोरेट घरानों और उद्यमियों को सस्ते दामों में ज़मीन और बाकी सुविधाएं देकर निवेश के लिए आकर्षित करने की कोशिश की.
इसका नतीजा यह हुआ कि वामदलों की रीढ़ माने जाने वाले किसान और ग़रीब कामगर उससे दूर हो गए.
उन्होंने सिंगूर और नंदीग्राम में कॉर्पोरेट घरानों के ख़िलाफ़ ज़बर्दस्त आंदोलन किया और आख़िरकार सत्ता वामदलों के हाथों से निकल गई.
चुनावी आंकड़ों की नज़र से देखें तो राज्य में तक़रीबन 28% मुस्लिम आबादी है, जो काफ़ी अहम है.
पहले वाम पार्टियां ग्रामीण बंगाल में अपनी धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से मुसलमान वोटरों को आकर्षित कर लेती थीं.
लेकिन बाद में सिंगूर और नंदीग्राम विरोधी आंदोलनों के बाद वामदलों के हाथों से उनके वोट निकल गए.

ममता बनर्जी ने मुसलमानों को लुभाया

सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने इस वर्ग को लुभाना शुरू कर दिया. उन्होंने हाई कोर्ट के निर्देशों को नज़रअंदाज़ करते हुए 1,22,000 इमामों और कुछ हज़ार मुअज़्ज़िनों को मासिक भत्ता देना शुरू कर दिया.
कोलकाता हाई कोर्ट ने कहा था कि हिंदू पुजारियों की मांग ख़ारिज़ करते हुए सिर्फ़ इमामों को भत्ता देना धर्म के आधार पर भेदभाव करने जैसा है.
इसके अलावा बंगाल में बांग्लादेश से आने वाले अवैध प्रवासियों का मामला भी है.
साल 1989 में सरकार ने संसद में एक रिपोर्ट पेश करते हुए कहा था कि राज्य के बांग्लादेश से सटे 11 ज़िलों में आबादी बढ़ने की दर देश की आबादी बढ़ने की दर से बहुत ज़्यादा है.
उसके बाद से पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और मेघालय की राजनीति में अवैध प्रवासियों का मामला उभरकर सामने आने लगा.
अवैध प्रवासियों को लेकर बीजेपी शुरू से ही सांप्रदायिक रुख अपनाती आई है.
बीजेपी के मुताबिक़ बांग्लादेश से आने वाले हिंदू 'शरणार्थियों' का भारत में स्वागत है, लेकिन वहीं से आने वाले मुसलमान 'अवैध प्रवासी' हैं और उन्हें भारत में रहने का कोई हक़ नहीं है.
साल 2014 के आम चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने बंगाल में बीजेपी के चुनावी अभियान का नेतृत्व किया था और उन्होंने अपने भाषणों में 'बांग्लादेशियों' को वापस भेजने की बात कही थी.
इन सब वजहों से मुस्लिम वोट ममता बनर्जी के पक्ष में चले गए और हिंदू वोट बीजेपी के पक्ष में. बीजेपी को पश्चिम बंगाल में लोकसभा दो सीटें मिलीं और 2016 के विधानसभा चुनाव में तीन सीटें.
वैसे तो हालिया पंचायत चुनाव में बीजेपी को ग्राम पंचायत के स्तर पर अच्छी खासी सीटें मिलीं लेकिन पंचायत समिति और जिला परिषद् में उसकी उपस्थिति न के बराबर ही है.
दूसरी तरफ़ एक सच यह भी है कि राज्य में सीपीआईएम और कांग्रेस जैसी सेक्युलर पार्टियां लगातार कमज़ोर हो रही हैं.
यही वजह है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के बड़े नेता बंगाल में तमाम राजनीतिक अभियानों में शामिल होते नज़र आ रहे हैं.
आरएसएस भी पश्चिम बंगाल में ज़मीनी काम में जुटी हुई है. राज्य में संघ की शाखाओं में लगातार बढ़त दर्ज की जा रही है.
साल 2013 में यहां संघ की 750 शाखाएं थीं जो 2018 में बढ़कर 1279 हो गईं. साल 2017 में रामनवमी के मौके पर बीजेपी और आरएसएस ने मिलकर राज्य के कई जिलों में भारी भीड़ जुटाई थी.